Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१२६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
इत्यादि भेद नहि पाडतो अर्थात् विकल्पो नहि करतो योगपरायणअर्थात् समरसीभावने
प्राप्त थयेलोयोगी पोताना शरीरनो पण ख्याल करतो नथी, तो शरीरथी भिन्न हितकारी
या अहितकारी वस्तुओनी चिंता करवानी तो वात ज शुं?
तथा ‘तत्त्वानुशासन’श्लोक १७२मां कह्युं छे केः
‘ते वखते (समाधिकालमां) आत्मामां आत्माने ज देखनार योगीने बाह्यमां पदार्थो
होवा छतां परम एकाग्रताना कारणे (आत्मा सिवाय) अन्य कांईपण भासतुं नथी (मालूम
पडतुं नथी).
भावार्थ :ज्यारे योगी ध्यानमां लीन होय छे, त्यारे ते समरसी भावनो अनुभव
करे छेअर्थात् निजानंदरसनुं पान करे छे. आत्मस्वरूपना अनुभव काळे ते आत्मतत्त्व
संबंधी. ते शुं छे? क्यां छे? इत्यादि संकल्पविकल्पोथी रहित होय छे. आ निर्विकल्प
दशामां तेने पोताना शरीर तरफ उपयोग जतो नथी, तो शरीरथी भिन्न अन्य पदार्थोनी
तो वात ज शुं करवी? अर्थात् बाह्य पदार्थो होवा छतां परम एकाग्रताने लीधे तेनो तेने
कांई पण अनुभव थतो नथी.
भेदविज्ञान द्वारा शरीरादिथी ममत्व हठावी ज्यारे योगी आत्मस्वरूपमां स्थिर थई
आनंदमग्न होय छे; त्यारे क्षुधातृषादिथी के उपसर्गपरीषहादिथी खेदखिन्न थतो नथी.
योगी स्वदेहमपि न चेतयति का कथा हिताहितदेहातिरिक्तवस्तुचेतनायाः
तथा चोक्तम् [तत्त्वानुशासने ]
‘‘तदा च परमैकाग्रूयाद्बहिरर्थेषु सत्स्वपि
अन्यन्न किञ्चनाभाति स्वमेवात्मनि पश्यत.’’ ।।१७२।।
विकल्पोंको न करता हुआ, किन्तु समरसीभावको प्राप्त हुआ योगी जो अपने शरीरतकका
भी ख्याल नहीं रखता, उसकी चिन्ता व परवाह नहीं करता, तब हितकारी या अहितकारी
शरीरसे भिन्न वस्तुओंकी चिन्ता करनेकी बात ही क्या ? जैसा कि कहा गया है
‘‘तदा
च परमैका’’
यहाँ पर शिष्य कहता है, कि भगवन् ! मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसी विलक्षण
विभिन्न दशाका हो जाना कैसे सम्भव है ?
उस समय आत्मामें आत्माको देखनेवाले योगीको बाहिरी पदार्थोंके रहते हुए भी
परम एकाग्रता होनेके कारण अन्य कुछ नहीं मालूम पड़ता है ।।४२।।