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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
इत्यादि भेद नहि पाडतो अर्थात् विकल्पो नहि करतो योगपरायण – अर्थात् समरसीभावने
प्राप्त थयेलो – योगी पोताना शरीरनो पण ख्याल करतो नथी, तो शरीरथी भिन्न हितकारी
या अहितकारी वस्तुओनी चिंता करवानी तो वात ज शुं?
तथा ‘तत्त्वानुशासन’ — श्लोक १७२मां कह्युं छे केः —
‘ते वखते (समाधिकालमां) आत्मामां आत्माने ज देखनार योगीने बाह्यमां पदार्थो
होवा छतां परम एकाग्रताना कारणे (आत्मा सिवाय) अन्य कांईपण भासतुं नथी (मालूम
पडतुं नथी).
भावार्थ : — ज्यारे योगी ध्यानमां लीन होय छे, त्यारे ते समरसी भावनो अनुभव
करे छे — अर्थात् निजानंदरसनुं पान करे छे. आत्मस्वरूपना अनुभव काळे ते आत्म – तत्त्व
संबंधी. ते शुं छे? क्यां छे? इत्यादि संकल्प – विकल्पोथी रहित होय छे. आ निर्विकल्प
दशामां तेने पोताना शरीर तरफ उपयोग जतो नथी, तो शरीरथी भिन्न अन्य पदार्थोनी
तो वात ज शुं करवी? अर्थात् बाह्य पदार्थो होवा छतां परम एकाग्रताने लीधे तेनो तेने
कांई पण अनुभव थतो नथी.
भेदविज्ञान द्वारा शरीरादिथी ममत्व हठावी ज्यारे योगी आत्म – स्वरूपमां स्थिर थई
आनंदमग्न होय छे; त्यारे क्षुधा – तृषादिथी के उपसर्ग – परीषहादिथी खेदखिन्न थतो नथी.
योगी स्वदेहमपि न चेतयति का कथा हिताहितदेहातिरिक्तवस्तुचेतनायाः ।
तथा चोक्तम् [तत्त्वानुशासने ] —
‘‘तदा च परमैकाग्रूयाद्बहिरर्थेषु सत्स्वपि ।
अन्यन्न किञ्चनाभाति स्वमेवात्मनि पश्यत.’’ ।।१७२।।
विकल्पोंको न करता हुआ, किन्तु समरसीभावको प्राप्त हुआ योगी जो अपने शरीरतकका
भी ख्याल नहीं रखता, उसकी चिन्ता व परवाह नहीं करता, तब हितकारी या अहितकारी
शरीरसे भिन्न वस्तुओंकी चिन्ता करनेकी बात ही क्या ? जैसा कि कहा गया है — ‘‘तदा
च परमैका०’’
यहाँ पर शिष्य कहता है, कि भगवन् ! मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसी विलक्षण
विभिन्न दशाका हो जाना कैसे सम्भव है ?
उस समय आत्मामें आत्माको देखनेवाले योगीको बाहिरी पदार्थोंके रहते हुए भी
परम एकाग्रता होनेके कारण अन्य कुछ नहीं मालूम पड़ता है ।।४२।।