Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 43.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १२७
समाधितंत्र श्लोक ३४मां* कह्युं छे केः
‘‘आत्मा अने देहना भेदविज्ञानथी उत्पन्न थयेला आह्लादथी (आनंदथी) जे
आनंदित छे, ते (योगी) तप द्वारा भयानक दुष्कर्मने भोगवतो होवा छतां खेद पामतो
नथी.’’ ४२.
अहीं, शिष्य कहे छेए केवी रीते? भगवन्! मने आश्चर्य थाय छे के एवी
अवस्थान्तर (विभिन्नविलक्षण अवस्था) केवी रीते संभवे?
गुरु कहे छेधीमन्! समज.
जे ज्यां वास करी रहे, त्यां तेनी रुचि थाय,
जे ज्यां रमण करी रहे, त्यांथी बीजे न जाय. ४३.
अन्वयार्थ :[यः ] जे [यत्र ] ज्यां [निवसन् आस्ते ] निवास करे छे, [सः ] ते
[तत्र ] त्यां [रतिं कुरुते ] रति करे छे अने [यः ] जे [यत्र ] ज्यां [रमते ] रमे छे, [सः ]
ते [तस्मात् ] त्यांथी बीजे [न गच्छति ] जतो नथी.
अत्राह शिष्यः कथमेतदिति भगवन् ! विस्मयो मे कथमेतदवस्थान्तरं संभवति
गुरुराहधीमन्निबोध
यो यत्र निवसन्नास्ते स तत्र कुरुते रतिं
यो यत्र रमते तस्मादन्यत्र स न गच्छति ।।४३।।
आचार्य कहते हैं, धीमन् ! सुनो समझो
जो जामें बसता रहे, सो तामें रुचि पाय
जो जामें रम जात है, सो ता तज नहिं जाय ।।४३।।
अर्थजो जहाँ निवास करने लग जाता है, वह वहाँ रमने लग जाता है और
जो जहाँ लग जाता है, वह वहाँसे फि र हटता नहीं है
* आत्मदेहान्तरज्ञानजनिताह्लादनिर्वृत्तः
तपसा दुष्कृतं घोरं भुञ्जानोऽपि न खिद्यते ।।
[समाधितन्त्रश्री पूज्यपादाचार्यः ]