कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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समाधितंत्र श्लोक ३४मां* कह्युं छे केः —
‘‘आत्मा अने देहना भेद – विज्ञानथी उत्पन्न थयेला आह्लादथी (आनंदथी) जे
आनंदित छे, ते (योगी) तप द्वारा भयानक दुष्कर्मने भोगवतो होवा छतां खेद पामतो
नथी.’’ ४२.
अहीं, शिष्य कहे छे — ए केवी रीते? भगवन्! मने आश्चर्य थाय छे के एवी
अवस्थान्तर (विभिन्न – विलक्षण अवस्था) केवी रीते संभवे?
गुरु कहे छे — धीमन्! समज.
जे ज्यां वास करी रहे, त्यां तेनी रुचि थाय,
जे ज्यां रमण करी रहे, त्यांथी बीजे न जाय. ४३.
अन्वयार्थ : — [यः ] जे [यत्र ] ज्यां [निवसन् आस्ते ] निवास करे छे, [सः ] ते
[तत्र ] त्यां [रतिं कुरुते ] रति करे छे अने [यः ] जे [यत्र ] ज्यां [रमते ] रमे छे, [सः ]
ते [तस्मात् ] त्यांथी बीजे [न गच्छति ] जतो नथी.
अत्राह शिष्यः कथमेतदिति । भगवन् ! विस्मयो मे कथमेतदवस्थान्तरं संभवति ।
गुरुराह — धीमन्निबोध ।
यो यत्र निवसन्नास्ते स तत्र कुरुते रतिं ।
यो यत्र रमते तस्मादन्यत्र स न गच्छति ।।४३।।
आचार्य कहते हैं, धीमन् ! सुनो समझो —
जो जामें बसता रहे, सो तामें रुचि पाय ।
जो जामें रम जात है, सो ता तज नहिं जाय ।।४३।।
अर्थ — जो जहाँ निवास करने लग जाता है, वह वहाँ रमने लग जाता है । और
जो जहाँ लग जाता है, वह वहाँसे फि र हटता नहीं है ।
* आत्मदेहान्तरज्ञानजनिताह्लादनिर्वृत्तः ।
तपसा दुष्कृतं घोरं भुञ्जानोऽपि न खिद्यते ।।
[समाधितन्त्र – श्री पूज्यपादाचार्यः ]