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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
टीका : — जे मनुष्य ज्यां एटले नगरादिमां स्वार्थ माटे अर्थात् कोई (प्रयोजननी)
सिद्धि अंगे (बंधु जनोना) आग्रहथी निवासी थईने रहे छे, ते त्यां अन्य तरफथी चित्त
हठावी लीधेलुं होवाथी, आनंद प्राप्त करे छे (अनुभवे छे) अने ज्यां जे आनंद अनुभवे
छे ते त्यांथी बीजे ठेकाणे जतो नथी ए (वात) प्रसिद्ध छे (प्रतीतजन्य) छे; माटे विश्वास
कर के, ‘आत्मामां निवास करता योगीने अननुभूत (पूर्वे नहि अनुभवेलां) अपूर्व आनंदनो
अनुभव थतो होवाथी, तेने बीजे ठेकाणे वृत्तिनो अभाव होय छे अर्थात् अध्यात्म सिवाय
बीजे ठेकाणे प्रवृत्ति होती नथी.’
भावार्थ : — जे माणस जे शहेर, नगर के ग्राममां रहे छे, तेने ते स्थान प्रति
एटलो ममत्वभाव – रतिभाव थई जाय छे के तेने त्यां ज रहेवानुं गमे छे, त्यां ज आनंद
आवे छे; ते स्थान छोडी बीजे जवुं तेने रुचतुं नथी; तेवी रीते आत्मस्वरूपमां स्थित
योगीने – रमता योगीने आत्मामां एवो अपूर्व आनंद आवे छे के तेने आत्मामां ज
विहार करवानुं रुचे छे, बीजा पदार्थोमां विहरवानी वृत्ति थती नथी, कारण के
निजात्मरसना अनुभव आगळ बाह्य पदार्थो तथा विषय भोगो बधा तेने नीरस तथा
दुःखदायी लागे छे. ४३.
अन्यत्र न प्रवर्ततो होय त्यारे ते आवो होयः —
टीका — यो जनो यत्र नगरादौ स्वार्थे सिद्ध्यङ्गत्वेन बद्धनिर्बन्धवास्तव्ये । भवन् तिष्ठति
स तस्मिन्नन्यस्मान्निवृत्तचित्ततत्त्वान्निवृतित्वं लभते । यत्र यश्च तथा निर्वाति स ततोऽन्यत्र न
यातीति प्रसिद्धं सुप्रतीतमत प्रतीहि योगिनोऽध्यात्मं निवसतोऽननुभूतापूर्वानन्दानुभवादन्यत्र
वृत्त्यभावः स्यादिति ।
अन्यत्राप्रवर्त्तमानश्चेदृक् स्यात् —
विशदार्थ — जो मनुष्य, जिस नगरादिकमें स्वार्थकी सिद्धिका कारण होनेसे
बन्धुजनोंके आग्रहसे निवासी बनकर रहने लग जाता है, वह उसमें अन्य तरफ से चित्त
हटाकर आनन्दका अनुभव करने लग जाता है । और जो जहाँ आनन्दका अनुभव करता
रहता है, वह वहाँसे दूसरी जगह नहीं जाता, यह सभी जानते हैं । इसलिये समझो कि
आत्मामें अध्यात्ममें रहनेवाले योगी अननुभूत (जिसका पहिले कभी अनुभव नहीं हुआ) और
अपूर्व आनन्दका अनुभव होते रहनेसे उसकी अध्यात्मके सिवाय दूसरी जगह प्रवृत्ति नहीं
होती ।।४३।।
जब दूसरी जगह प्रवृत्ति नहीं करता तब क्या होता है ? उसे आगेके श्लोकमें
आचार्य कहते हैं —