कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १२९
विशेषोथी अज्ञात रही, निज रूपमां लीन थाय,
सर्व विकल्पातीत ते छूटे, नहि बंधाय. ४४
अन्वयार्थ : — [अगच्छन् ] (बीजे ठेकाणे) नहि जतो (अन्यत्र प्रवृत्ति नहि करतो
योगी) [तद्विशेषाणाम ] तेना विशेषोनो (अर्थात् देहादिना विशेषोनो सौन्दर्य, असौन्दर्यादि
धर्मोनो) [अनभिज्ञः च जायते ] अनभिज्ञ रहे छे (तेनाथी अजाण रहे छे) अने
[अज्ञाततद्विशेषः ] (सौन्दर्य – असौन्दर्यादि) विशेषोनो अजाण होवाथी [न बध्यते ] ते बंधातो
नथी, [तु विमुच्यते ] परंतु विमुक्त थाय छे.
टीका : — स्वात्म – तत्त्वमां स्थिर थयेलो योगी, ज्यारे बीजे ठेकाणे जतो नथी
प्रवृत्ति करतो नथी, त्यारे ते स्वात्माथी भिन्न शरीरादिना विशेषोथी अर्थात् सौन्दर्य
– असौन्दर्यादि धर्मोनो अनभिज्ञ (अजाण) रहे छे. अर्थात् ते जाणवाने अभिमुख (उत्सुक)
थतो नथी अने ते विशेषोथी ते अज्ञात होवाथी तेमां तेने राग – द्वेष उत्पन्न थता नथी;
तेथी ते कर्मोथी बंधातो नथी. त्यारे शुं थाय छे? विशेष करीने (खास करीने) व्रतादिनुं
अनुष्ठान (आचरण) करनाराओ करतां ते अतिरेकथी (अतिशयपणे) तेमनाथी (कर्मोथी)
मुक्त थाय छे.
भावार्थ : — आत्मस्वरूपमां स्थिर योगीने आत्मा सिवाय शरीरादि बाह्य पदार्थोमां
वस्तु विशेष विकल्प को, नहिं करता मतिमान ।
स्वात्मनिष्ठता से छुटत, नहिं बँधता गुणवान ।।४४।।
अर्थ — अध्यात्मसे दूसरी जगह प्रवृत्ति न करता हुआ योगी, शरीरादिककी सुन्दरता
– असुन्दरता आदि धर्मोंकी ओर विचार नहीं करता । और जब उनके विशेषोंको नहीं
जानता, तब वह बन्धको प्राप्त नहीं होता, किन्तु विशेष रूपसे छूट जाता है ।
विशदार्थ — स्वात्मतत्त्वमें स्थिर हुआ योगी जब अध्यात्मसे भिन्न दूसरी जगह प्रवृत्ति
नहीं करता, तब उस स्वात्मासे भिन्न शरीरादिके सौन्दर्य – असौन्दर्य आदि विशेषोंसे अनभिज्ञ
हो जाता है । और जब उनकी विशेषताओं पर ख्याल नहीं करता, तब उनमें राग-द्वेष
अगच्छंस्तद्विशेषाणामनभिज्ञश्च जायते ।
अज्ञाततद्विशेषस्तु बध्यते न विमुच्यते ।।४४।।
टीका — स्वात्मतत्त्वनिष्ठोऽन्यत्र अगच्छन्नप्रवर्तमानस्तस्य स्वात्मनोऽन्यस्य देहादेः
विशेषाणां सौन्दर्यासौन्दर्यादिधर्माणामनभिज्ञ आभिमुख्येनाप्रतिपत्तश्च भवति । अज्ञाततद्विशेषः