कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ३५
अपि च — आत्मनि सति परसंज्ञा, स्वपरविभागात् परिग्रहद्वेषौ ।
अनयोः संप्रतिबद्धाः सर्वे दोषाश्च जायन्ते ।।
सा दीर्धनेत्रायतमन्थाकर्षणपाश इव भ्रमणहेतुत्वात्तस्यापकर्षणकर्मजीवस्य रागादिरूपतया
परिणमनं नेत्रस्यापकर्षणत्वाभिभुखानयनं तेन अत्रोपमानभूतो मन्थदण्ड आक्षेप्यस्तेन यथा —
नेत्राकर्षणव्यापारेण मन्थाचलः समुद्रे सुचिरं भ्रान्तो लोके प्रसिद्धस्तथा स्वपरविवेकानवबोधात् ।
यदुद्भूतेन रागादिपरिणामेन कारणकार्योपचारात्तज्जनितकर्मबन्धेन अनादिकालं संसारे भ्रान्तो
यह निश्चय है । इन दोनों (राग-द्वेष)के आलम्बनसे मन अधिक चंचल हो उठता है । और
जितने दोष हैं, वे सब राग-द्वेषके संबद्ध हैं,’’ जैसा कि कहा गया है — ‘‘आत्मनि सति
परसंज्ञा०’’
‘‘निजत्वके होने पर परका ख्याल हो जाता और जहाँ निज-परका विभाग (भेद) हुआ
वहाँ निजमें रागरूप और परमें द्वेषरूप भाव हो ही जाते हैं । बस इन दोनोंके होनेसे अन्य
समस्त दोष भी पैदा होने लग जाते हैं, कारण कि वे सब इन दोनोंके ही आश्रित हैं ।’’
वह राग-द्वेषकी जोड़ी तो हुई मंथानीके डंडेको घुमानेवाली रस्सीके फाँसाके समान
और उसका घूमना कहलाया जीवका रागादिरूप परिणमन । सो जैसे लोकमें यह बात
प्रसिद्ध है कि नेतरीके खींचा-तानीसे जैसे मंथराचल पर्वतको समुद्रमें बहुत काल तक भ्रमण
(राग-द्वेषना) अवलंबनथी मन अधिक विकारी बने छे (क्षोभ पामे छे – चंचळ बने
छे).’ (२३)
वळी, ज्यां मारापणानो भाव आवे छे, त्यां परसंज्ञा (पर तरफनो भाव) आवे
छे. स्व – परना विभागने लीधे राग-द्वेष होय छे, (अर्थात् ज्यां आ मारुं छे अने ए
बीजानुं छे – एवो स्व – परनो विभाग – भेद छे, त्यां स्वमां रागरूप अने परमां द्वेषरूप भाव
थाय छे). आ बंने दोषो साथे संबंध राखता (अन्य) सर्व दोषो उत्पन्न थाय छे (अर्थात्
अन्य सर्व दोषोनुं मूळ राग-द्वेष छे).
जेने मन्थनदंडना भ्रमणनुं कारण तेने खेंचवामां पाशरूप दीर्घनेतरां (दोरी)ना
आकर्षणनी (खेंचताणनी) क्रिया छे, तेम जीवने (संसारमां) भ्रमणनुं कारण तेनुं रागादिरूप
परिणमवुं ते छे. नेतरांना आकर्षणथी अभिमुख लावेलो उपमानभूत (जेनी साथे जीवनी
सरखामणी छे तेवो) मंथनदंड भमवा योग्य छे.
लोकमां ए वात प्रसिद्ध छे, के नेतरां (दोरीओ)नी खेंचताणनी क्रियाथी (आकर्षणनी
क्रियाथी) जेम मंथराचल पर्वत समुद्रमां बहु लांबा काळ सुधी घूमतो रह्यो, तेम स्व – परना