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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
टीका — भ्रमति संसरति । कोऽसौ ? असौ जीवश्चेतनः । क्व ? संसाराब्धौसंसारः
द्रव्यपरिवर्तनादिरूपो भवोऽब्धिः समुद्र इव दुःखहेतुत्वाद् दुस्तरत्त्वाच्च तस्मिन् । कस्मात् ?
अज्ञानात् देहादिष्वात्मविभ्रमात् । कियत्कालं, सुचिरं अतिदीर्घकालम् । केन ? रागेत्यादि । रागः
इष्टे वस्तुनि प्रीतिः द्वेषश्चानिष्टेऽप्रीतिस्तयोर्द्वयी । रागद्वेषयोः शक्तिव्यक्तिरूपतया युगपत्
प्रवृत्तिज्ञापनार्थं द्वयीग्रहणं, शेषदोषाणां च तद्द्वयप्रतिबद्धत्वबोधनार्थं ।
तथा चोक्तम् [ज्ञानार्णवे ] —
यत्र रागः पदं धत्ते, द्वेषस्तत्रेति निश्चयः ।
उभावेतौ समालम्ब्य विक्रमत्यधिकं मनः ।।२३।।
विशदार्थ — द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भावरूप पंचपरावर्तनरूप संसार, जिसे दुःखका
कारण और दुस्तर होनेसे समुद्रके समान कहा गया है, उसमें अज्ञानसे-शरीरादिकोंमें
आत्मभ्रान्तिसे-अतिदीर्घ काल तक घूमता (चक्कर काटता) रहता है । इष्ट वस्तुमें प्रीति होनेको
राग और अनिष्ट वस्तुमें अप्रीति होनेको द्वेष कहते हैं । उनकी शक्ति और व्यक्तिरूपसे हमेशा
प्रवृत्ति होती रहती है, इसलिए आचार्योंने इन दोनोंकी जोड़ी बतलाई है । बाकीके दोष इस
जोड़ीमें ही शामिल है, जैसा कि कहा गया है : — ‘‘यत्र रागः पदं धत्ते०’’
‘‘जहाँ राग अपना पाँव जमाता है, वहाँ द्वेष अवश्य होता है या हो जाता है,
टीका : — भमे छे एटले संसरण करे छे. कोण ते? ते जीव – चेतन. क्यां (भमे
छे)? संसार – समुद्रमां, संसार एटले द्रव्यपरिवर्तनादिरूप भव, जे दुःखनुं कारण अने
दुस्तर होवाथी अब्धि एटले समुद्र जेवो छे – तेमां. शा कारणथी भमे छे? अज्ञानने लीधे
अर्थात् देहादिमां आत्मविभ्रमना कारणे. केटला काळ सुधी (भमे छे)? सुचिर एटले बहु
लांबा काळ सुधी. शाथी? ‘रागेत्यादि०’ राग इत्यादिथी.
राग एटले इष्ट वस्तुमां प्रीति अने द्वेष एटले अनिष्ट वस्तुमां अप्रीति, ते बंनेनुं
युगल. राग – द्वेषनी प्रवृत्ति, शक्तिरूपे तथा व्यक्तिरूपे हंमेशां एकीसाथे होय छे; ते
जणाववा माटे तथा बाकीना दोषो पण ते (बंनेना) युगलमां गर्भित छे (अर्थात् सामेल
छे – ते साथे संबंध राखे छे) ते बताववा माटे (आचार्ये) ते बंनेनुं (राग – द्वेषनुं युगल)
ग्रहण कर्युं छे.
वळी, ‘ज्ञानार्णव’मां कह्युं छे के —
‘ज्यां राग पोतानो पग जमावे छे (राखे छे) त्यां द्वेष अवश्य होय छे. ते बंनेना