Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 11.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ३३
अत्र विनेयः पृच्छति हिताहितयो रागद्वेषौ कुर्वन् किं कुरुते ? इति दारादिषु रागं शत्रुषु
च द्वेषं कुर्वाणः पुरुषः किमात्मनेऽहितं कार्यं करोति येन तावदकार्यतयोपदिश्यते इत्यर्थः
अत्राचार्य, समाधत्ते
रागद्वेषद्वयी दीर्घनेत्राकर्षणकर्मणा
अज्ञानात्सुचिरं जीवः संसाराब्धौ भ्रमत्यसौ ।।११।।
यहाँ पर शिष्य प्रश्न करता है, कि स्त्री आदिकोंमें राग और शत्रुओंमें द्वेष करनेवाला
पुरुष अपना क्या अहितबिगाड़ करता है ? जिससे उनको (राग-द्वेषोंको) अकारणीय
न करने लायक बतलाया जाता है ? आचार्य समाधान करते हैं :
मथत दूध डोरीनितें, दंड फि रत बहु बार
राग द्वेष अज्ञानसे, जीव भ्रमत संसार ।।११।।
अर्थयह जीव अज्ञानसे राग-द्वेषरूपी दो लम्बी डोरियोंकी खींचतानीसे संसाररूपी
समुद्रमें बहुत काल तक घूमता रहता हैपरिवर्तन करता रहता है
छे? कारण के ‘संसारमां ए सुनिश्चित वात छे के जे कोई माणस बीजाने सुख या दुःख
आपे छे, तेने बीजा तरफथी सुख या दुःख ज प्राप्त थाय छे.
माटे पोतानुं हित चाहनार बुद्धिमान पुरुषे अहित करनार व्यक्ति प्रत्ये अप्रीति
के द्वेष करवो योग्य नथी. १०.
अहीं, शिष्य पूछे छेहित अने अहित करनाराओ प्रत्ये रागद्वेष करनार शुं
करे छे? (स्त्री, आदि प्रत्ये राग अने शत्रुओ प्रत्ये द्वेष करनार पुरुष पोतानुं शुं अहित
कार्य करे छे, जेथी राग
द्वेष करवा योग्य नथीएम तेने उपदेशवामां आवे छे?
अहीं, आचार्य समाधान करे छे
दीर्घ दोर बे खेंचतां, भमे दंड बहु वार,
रागद्वेष अज्ञानथी, जीव भमे संसार. ११.
अन्वयार्थ :[असौ जीवः ] आ जीव [अज्ञानात् ] अज्ञानथी [रागद्वेषद्वयी-
दीर्घनेत्राकर्षणकर्मणा ] रागद्वेषरूपी बे लांबी दोरीओनी (नेतरांनी) खेंचताणना कार्यथी
[संसाराब्धौ ] संसार समुद्रमां [सुचिरं ] बहु लांबा काळ सुधी [भ्रमति ] घूमतो रहे छेभमतो
रहे छे.