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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
इत्यभिधानादन्याय्यमेतदिति भावः । अत्र दृष्टान्तमाचष्टे । त्र्यंगुलमित्यादि – पात्यते भूमौ
क्षिप्यते । कोऽसौ ? यः कश्चिदसमीक्ष्यकारी जनः, केन ? दण्डेन हस्तधार्यकाष्ठेन । कथं ?
स्वयं — पात्यते प्रेरणमन्तरेणैव । किं कुर्वन् ? पातयन् भूमिं प्रति नामयन् । किं तत् ? त्र्यङ्गुलं
अङ्गुलित्रयाकारं कच्चराद्याकर्षणावयवम् । काभ्यां ? पादाभ्यां, ततोऽहिते प्रीतिरहिते चाप्रीतिः
स्वहितैषिणा प्रेक्षावता न करणीया ।
भाई ! सुनिश्चित रीति या पद्धति यही है, कि संसारमें जो किसीको सुख या दुःख
पहुँचाता है, वह उसके द्वारा सुख और दुःखको प्राप्त किया करता है । जब तुमने किसी
दूसरेको दुःख पहुँचाया है तो बदलेमें तुम्हें भी उसके द्वारा दुःख मिलना ही चाहिए । इसमें
गुस्सा करनेकी क्या बात है ? अर्थात् गुस्सा करना अन्याय है, अयुक्त है । इसमें दृष्टान्त
देते हैं कि जो बिना विचारे काम करनेवाला पुरुष है वह तीन अंगुलीकी आकारवाले कूड़ा
कचरा आदिके समेटनेके काममें आनेवाले ‘अंगुल’ नामक यंत्रको पैरोंले जमीन पर गिराता
है, तो यह बिना किसी अन्यकी प्रेरणाके स्वयं ही हाथमें पकड़े हुए डंडेसे गिरा दिया जाता
है । इसलिए अहित करनेवाले व्यक्तिके प्रति, अपना हित चाहनेवाले बुद्धिमानोंको, अप्रीति,
अप्रेम या द्वेष नहीं करना चाहिए ।।१०।।
(अर्थात् सामो अपकार करनार पुरुष उपर कोप करवो) ते अन्याययुक्त छे
(अयोग्य छे) — एवो आ कथननो भाव छे.
अहीं (आ बाबतमां) द्रष्टान्त कहे छे — त्र्यङ्गुलमित्यादि०’
पाडवामां आवे छे, एटले (कोईथी) भूमि उपर पटकवामां आवे छे. कोण ते?
कोई अविचार्युं काम करनार माणस. कोना वडे (पाडवामां आवे छे)? दंड वडे अर्थात्
हाथमां राखेला काष्ट (लाकडा) वडे. केवी रीते? स्वयं पाडवामां आवे छे — (कोईनी) प्रेरणा
विना ज. शुं करतां? (नीचे) पाडतां एटले भूमि तरफ नमावतां. शुं (नमावतां)? त्र्यंगुलने
अर्थात् त्रण आंगळांना आकारवाळां कूडा – कचरादिने खेंचनार यंत्रने. शा वडे? बे पग वडे.
माटे अहित करनार अर्थात् प्रीतिरहित व्यक्ति प्रत्ये, पोतानुं हित इच्छनार
बुद्धिमान (पुरुषे) अप्रीति एटले द्वेष करवो जोईए नहि.
भावार्थ : — मनुष्य माटी खोदवा के कचरो खेंचवा माटे त्र्यंगुलने नीचे पाडे छे,
त्यारे तेने पण स्वयं नीचे पडवुं पडे छे, कारण के तेनो दंड (हाथो) नानो होय छे. ते
त्र्यंगुलने नीचे पाडे छे तो त्र्यंगुलनो दंड पण तेने नीचे पाडे छे; तेम जो तमे कोईने दुःखी
करो अने बीजो कोई तमने दुःखी करे अने तेना उपर गुस्से थाओ, ए केटलो अन्याय