Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 10.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ३१
विराधकः कथं हंत्रे जनाय परिकुप्यति
त्र्यङ्गुलंपातयन् पद्भ्यां स्वयं दण्डेन पात्यते ।।१०।।
टीकाकथमित्यरुचौ न श्रद्दधे कथं परिकुप्यति समन्तात् क्रुध्यति कोऽसौ ?
विराधकः अपकारकर्त्ता जनः कस्मै हन्त्रे जनाय प्रत्यपकारकाय लोकाय
‘सुखं वा यदि दुःखं येन यस्य कृतं भुवि
अवाप्नोति स तत्तस्मादेष मार्गः सुनिश्चितः ।।
अपराधी जन क्यों करे, हन्ता जनपर क्रोध
दो पग अंगुल महि नमे, आपहि गिरत अबोध ।।१०।।
अर्थजिसने पहिले दूसरेको सताया या तकलीफ पहुँचाई है, ऐसा पुरुष उस
सताये गये और वर्तमानमें अपनेको मारनेवालेके प्रति क्यों गुस्सा करता है ? यह कुछ
जँचता नहीं
अरे ! जो त्र्यङ्गुलको पैरोंसे गिराएगा वह दंडेके द्वारा स्वयं गिरा दिया
जायगा
विशदार्थदूसरेका अपकार करनेवाला मनुष्य, बदलेमें अपकार करनेवालेके प्रति
क्यों हर तरहसे कुपित होता है ? कुछ समझमें नहीं आता
अपराधी जन कां करे, हन्ता जन पर क्रोध?
पगथी त्र्यंगुल पाडतां, दंडे पडे अबोध. १०
अन्वयार्थ :[विराधकः ] विराधक (जेणे पहेलां बीजाने हेरान कर्यो हतोदुःख
आप्युं हतुंएवो पुरुष) [हन्त्रे जनाय ] (वर्तमानमां) पोताने मारनार माणस प्रत्ये [कथं
परिकुष्यति ] केम गुस्सो करे छे? (अरे देखो!) [त्र्यंङ्गुलं ] त्र्यंगुलने [पद्भ्यां ] पगोथी
[पातयन् ] नीचे पाडनार (मनुष्य) [स्वय ] स्वयं [दण्डेन ] दंड वडे (त्र्यंगुलना दंड वडे)
[पात्यते ] नीचे पडाय छे.
टीका :[अरुचि(अणगमाना) अर्थमां कथम् शब्द छे]. मने श्रद्धामां बेसतुं
नथी (मने समजवामां आवतुं नथी) के केम परिकोप करे छे अर्थात् सर्वप्रकारे केम
कोपायमान थाय छे? कोण ते? विराधक एटले अपकार करनार माणस. कोना उपर (कोप
करे छे)? हणनार माणस उपर एटले सामो अपकार करनार लोक उपर.
‘संसारमां ए सुनिश्चित रीति छे के जे जेने सुख के दुःख आपे छे, ते तेना तरफथी
ते (सुख के दुःख) पामे छे.