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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अहितवर्गेऽपि दृष्टान्तः प्रदर्श्यते अस्माभिरिति योज्यम् : —
उत्थानिका — आचार्य आगेके श्लोकमें शत्रुओंके प्रति होनेवाले भावोंको ‘ये हमारे
शत्रु हैं’ ‘अहितकर्ता हैं’ आदि अज्ञानपूर्ण बतलाते हुए उसे दृष्टान्त द्वारा समझाते हैं, साथ
ही ऐसे भावोंको दूर करनेके लिए प्रेरणा भी करते हैं : —
भावार्थ : — जेवी रीते पक्षीओ जुदी जुदी दिशा अने देशोथी आवी रात्रे वृक्ष
उपर एकठां निवास करे छे अने सवारे पोतपोताना कार्य अंगे इच्छानुसार कोई देश
या दिशामां ऊडी जाय छे, तेवी रीते संसारी जीवो नरकगति आदिरूप स्थानोथी आवी
एक कुटुंबमां जन्म ले छे अने त्यां पोताना आयुकाल सुधी कुटुंबीजनो साथे रहे छे,
पछी पोतानी आयु पूरी थतां तेओ पोतपोतानी योग्यतानुसार देवगति आदि स्थानोमां
चाल्या जाय छे.
जेम पक्षीओ जे दिशाएथी अने देशमांथी आवे ते ज दिशा – देशमां पाछा जाय
एवो कोई नियम नथी, तेम संसारी जीवो पण आयु पूरी थतां जे गतिमांथी आव्या
हता ते ज गति – स्थानोमां फरी जाय एवो कोई नियम नथी; पोतपोतानी
योग्यतानुसार नवी गतिमां जाय छे.
आचार्य शिष्यने बोधरूपे कहे छे, ‘‘हे भद्र! शरीरादि पदार्थो ताराथी सर्वथा
भिन्न स्वभाववाळा छे. जो तेओ तारा होय, तो बन्ने जुदा पडी केम चाल्या जाय
छे? जो तेओ तारा आत्मस्वरूप होय तो आत्मा तो तेना त्रिकाली स्वरूपे तेनो ते
ज रहे छे अने तेनी साथे शरीरादि संयोगी पदार्थो तो तेना ते रहेता नथी. जो
तेओ आत्मस्वरूप होय तो आत्मानी साथे ज रहेवां जोईए पण तेम तो जोवामां
आवतुं नथी; माटे तेमने आत्मस्वरूप मानवा ते भ्रम छे अर्थात् शरीरादि पर पदार्थोमां
हितबुद्धिए आत्मभाव या आत्मीयभाव करवो ते अज्ञानता छे. वस्तुस्वरूप समजी
आत्मभाव वा आत्मीयभावनो परित्याग करवो ते श्रेयस्कर छे.’’ अहीं पण ‘सर्वथा’
संबंधी आ पूर्वेनी गाथामां जेम कह्युं छे तेम समजवुं.
अहित वर्ग संबंधमां पण अमे द्रष्टान्त आपीशुं – एम योजवुं. (अर्थात् शत्रुओ
प्रति ‘आ अमारो शत्रु छे – अहितकर्ता छे’ – एवो भाव अज्ञानजनित छे, ते द्रष्टान्त
द्वारा आचार्य बतावे छे.)