Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ २९
कासु ? दिक्षु दिग्देशेष्विति; प्राप्तेर्विपर्ययनिर्द्देशो गमननियमनिवृत्त्यर्थस्तेन, यो यस्याः दिशः
आयातः स तस्यामेव दिशि गच्छति यश्च यस्माद्देशादायात् स तस्मिन्नेवदेशे गच्छतीति नास्ति
नियमः
किं तर्हि ? यत्र क्वापि यथेच्छं गच्छतीत्यर्थः कस्मात् स्वस्वकार्यवशात्
निजनिजकरणीयपारतंत्र्यात् कदा कदा ? प्रगे प्रगे प्रातः प्रातः एवं संसारिणो जीवा अपि
नरकादिगतिस्थानेभ्य आगत्य कुले स्वायुःकालं यावत् संभूय तिष्ठन्ति तथा निजनिजपारतन्त्र्यात्
देवगत्यादिस्थानेष्वनियमेन स्वायुःकालान्ते गच्छन्तीति प्रतीहि
कथं भद्र ! तव दारादिषु
हितबुद्धया गृहीतेषु सर्वथान्यस्वभावेषु आत्मात्मीयभावः ? यदि खलु एते त्वदात्मका स्युः तदा
त्वयि तदवस्थे एव कथमवस्थान्तरं गच्छेयुः यदि च एते तावकाः स्युस्तर्हि कथं त्वत्प्रयोगमंतरेणैव
यत्र क्वापि प्रयान्तीति मोहग्रहावेशमपसार्य यथावत्पश्येति दार्ष्टान्ते दर्शनीयम्
।।
हों उसी ओर जावें वे तो कहींसे आते हैं और कहींको चले जाते हैंवैसे संसारी जीव भी
नरकगत्यादिरूप स्थानोंसे आकर कुलमें अपनी आयुकाल पर्यन्त रहते हुए मिल-जुलकर रहते
हैं, और फि र अपने अपने कर्मोंके अनुसार, आयुके अंतमें देवगत्यादि स्थानोंमें चले जाते हैं
हे भद्र ! जब यह बात है तब हितरूपसे समझे हुए, सर्वथा अन्य स्वभाववाले स्त्री आदिकोंमें
तेरी आत्मा व आत्मीय बुद्धि कैसी ? अरे ! यदि ये शरीरादिक पदार्थ तुम्हारे स्वरूप होते
तो तुम्हारे तद्वस्थ रहते हुए, अवस्थान्तरोंको कैसे प्राप्त हो जाते ? यदि ये तुम्हारे स्वरूप
नहीं अपितु तुम्हारे होते तो प्रयोगके बिना ही ये जहाँ चाहे कैसे चले जाते ? अतः मोहनीय
पिचाशके आवेशको दूर हटा ठीक ठीक देखनेकी चेष्टा कर
।।।।
छे. शाथी (जाय छे)? पोतपोताना कार्यवशात् अर्थात् पोतपोताने करवा योग्य कार्यनी
पराधीनताने लीधे. क्यारे क्यारे (जाय छे)? सवारे, सवारे.
ए प्रमाणे संसारी जीवो पण नरकादि गतिस्थानोथी आवीने कुळमां (कुटुंबमां)
पोताना आयुकाळ सुधी एकठा थईने रहे छे अने पोताना आयुकाळना अंते पोतपोतानी
पराधीनताने लीधे अनियमथी (नियम विना) देवगति आदि स्थानोमां चाल्या जाय छे
एम प्रतीति (विश्वास) कर.
तो हे भद्र! हितबुद्धिए ग्रहेलां (अर्थात् आ हितकारक छे एम समजीने पोतानां
मानेलां) स्त्री आदि जे सर्वथा भिन्न स्वभाववाळां छे, तेमां तारो आत्मा तथा आत्मीयभाव
केवो? जो खरेखर तेओ (शरीरादिक) तारा आत्मस्वरूप होय, तो तुं ते अवस्थामां ज
होवा छतां तेओ बीजी अवस्थाने केम प्राप्त थाय छे? जो तेओ तारां होय तो तारा
प्रयोग विना तेओ ज्यां
त्यां केम चाल्यां जाय छे? माटे मोहजनित आवेशने हठावीने
जेम (वस्तुस्वरूप) छे, तेम जोएम दार्ष्टान्तमां समजवा योग्य छे.