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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
दिग्देशेभ्यः खगा एत्य संवसन्ति नगे नगे ।
स्वस्वकार्यवशाद्यान्ति देशे दिक्षु प्रगे प्रगे ।।९।।
टीका — संवसन्ति मिलित्वा रात्रिं यावन्निवासं कुर्वन्ति । के ते ? खगाः पक्षिणः । क्व
क्व ? नगे नगे वृक्षे वृक्षे । किं कृत्त्वा ? एत्य आगत्य । केभ्यो ? दिग्देशेभ्यः, दिशः पूर्वादयो
दश, देशस्तस्यैकदेशो अङ्गवङ्गादयस्तेभ्योऽवधिकृतेभ्यः । तथा यान्ति गच्छन्ति । के ते ? स्वगाः ।
दिशा देशसे आयकर, पक्षी वृक्ष बसन्त ।
प्रात होत निज कार्यवश, इच्छित देश उड़न्त ।।९।।
अर्थ — देखो, भिन्न-भिन्न दिशाओं व देशोंसे उड़ उड़कर आते हुए पक्षिगण वृक्षों
पर आकर रैनबसेरा करते हैं और सबेरा होने पर अपने-अपने कार्यके वशसे भिन्न-भिन्न
दिशाओं व देशोंमें उड़ जाते हैं ।
विशदार्थ — जैसे पूर्व आदिक दिशाओं एवं अंग, बंग आदि देशोंसे उड़कर पक्षिगण
वृक्षों पर आ बैठते हैं, रात रहने तक वहीं बसेरा करते हैं और सबेरा होने पर अनियत
दिशा व देशकी ओर उड़ जाते हैं – उनका यह नियम नहीं रहता है कि जिस देशसे आये
दिशा – देशथी आवीने, पक्षी वृक्षे वसन्त,
प्रातः थतां निज कार्यवश, विधविध देश उडन्त. ९
अन्वयार्थ : — [खगाः ] पक्षीओ [दिग्देशेभ्यः ] (पूर्वादि) दिशाओथी अने (अंग,
बंग आदि) देशोथी [एत्य ] आवीने [नगे नगे ] वृक्षो उपर [संवसन्ति ] निवास करे छे अने
[प्रगे प्रगे ] प्रातःकाल थतां [स्वस्वकार्यवशात् ] पोतपोताना कार्यवशात् [देशे दिक्षु ] (जुदा जुदा)
देशो अने दिशाओमां [यान्ति ] चाल्यां जाय छे.
टीका : — संवास करे छे एटले एकठा थई रात सुधी निवास करे छे. कोण ते?
पक्षीओ. क्यां क्यां (निवास करे छे)? वृक्षो उपर. शुं करीने? आवीने. क्यांथी (आवीने)?
दिशाओ अने देशोथी; दिशाओ एटले पूर्वादि दश दिशाओ; देश एटले तेनो एक भाग –
अंग, बंग आदि; ते अवधिकृत (मर्यादित) – देशोथी (आवे छे) तथा जाय छे. कोण ते?
पक्षीओ. क्यां (जाय छे?) दिशाओमां अर्थात् दिशाओ अने देशोमां. प्राप्त करेला स्थानथी
तेमनो जवानो नियम ऊलटो छे एवो निर्देश छे, अर्थात् जवाना नियमनो अभाव छे.
एवो अर्थ छे. जे जे दिशाएथी आव्यां ते ते ज दिशामां जाय अने जे देशथी आव्यां
ते ते ज देशमां जाय – एवो नियम नथी, तो केम छे? ज्यां त्यां इच्छानुसार तेओ जाय