कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ २७
उत्थानिका — शरीर आदिक पदार्थ जो कि मोहवान् प्राणीके द्वारा उपकारक एवं
हितू समझे जाते हैं, वे सब कैसे हैं, इसको आगे श्लोकमें उल्लिखित दृष्टांत द्वारा दिखाते
हैं : —
भावार्थ : – स्व – परना भेदविज्ञानथी रहित मूढ जीवो, द्रव्य – क्षेत्र – काळ – भावरूपे
आत्मस्वभावथी सर्वथा भिन्न स्वभाववाळां जे शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र आदि
पदार्थो छे; तेमने स्व तथा आत्मीय (स्वीय) – पोतानां माने छे.
असद्भूत व्यवहारनये आ बधां, जीवनां कहेवामां आवे छे एटले के ए बधांनो
संयोग जीवने छे खरो, पण ते जीवथी सर्वथा भिन्न छे; ते दर्शाववा माटे प्रस्तुत मूळ
गाथामां तेम ज टीकामां सर्वथा शब्द वापर्यो छे.
आ रीते मूढ जीवो पोताना आत्मस्वभावथी सर्वथा भिन्न स्वभाववाळा पदार्थोमां
आत्मबुद्धि अने आत्मीयबुद्धि करी दुःखी थाय छे.
समाधितंत्र — श्लोक ५६मां पण कह्युं छे के —
अनात्मीयात्मभूतेषु ममाहमिति जाग्रति ।
अज्ञानी जीव, अनात्मीयभूत एटले आत्मीय नहि एवां स्त्री – पुत्रादिकमां, ‘ए मारां
छे’ अने अनात्मभूत एटले आत्मभूत नहि एवा शरीरादिकमां, ‘ए हुं छुं’ एवो
अध्यवसाय (विपरीत मान्यता) करे छे. ८
अहीं, हितवर्गने उद्देशीने द्रष्टान्त छे.
अहीं, एटले शरीरादि मध्ये जे हितकारक एटले उपकारक स्त्री आदिनो वर्ग एटले
गण (समूह) छे, तेमने उद्देशीने एटले तेमने विषय करीने (ते केवां छे ते समजाववा
माटे) अमे द्रष्टान्त एटले उदाहरण आपीए छीए. ते आ प्रमाणे छे —
[शरीरादि पदार्थो जेने मोहवान प्राणी उपकारक वा हितकारक माने छे, ते बधा
केवा छे ते द्रष्टांत द्वारा आचार्य समजावे छे.]
अत्र हितवर्गमुद्दिश्य दृष्टान्तः ।
अत्रैतेषु वपुरादिषु मध्ये हितानामुपकारकाणां दारादीनां वर्गो गणस्तमुद्दिश्य विषयीकृत्य
दृष्टान्त उदाहरणं प्रदर्श्यते । अस्माभिरिति शेषः ।
तद्यथा —