Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 26 of 146
PDF/HTML Page 40 of 160

 

background image
२६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
टीकाप्रपद्यते कोऽसौ ? मूढः स्वपरविवेकज्ञानहीनः पुमान् कानि, वपुर्गृहादीनि
वस्तूनि किंविशिष्टानि ? स्वानि स्वश्चात्मा स्वानि चात्मीयानि स्वानि एकशेषाश्रयणादेकस्य
स्वशब्दस्य लोपः अयमर्थो दृढतममोहाविष्टो देहादिकमात्मानं प्रपद्यतेआत्मत्वेनाभ्युपगच्छति
दृढतरमोहाविष्टश्च आत्मीयत्वेन किं विशिष्टानि सन्ति स्वानि प्रपद्यत इत्याह
सर्वथान्यस्वभावानिसर्वेण द्रव्यक्षेत्रकालभाव लक्षणेन प्रकारेण स्वस्वभावादन्यो भिन्नः
स्वभावो येषां तानि किं किमित्याहवपुः शरीरं तावदचेतनत्वादिस्वभावं प्रसिद्धमस्ति एवं गृहं
धनं दारा भार्याः पुत्राः आत्मजाः मित्राणि सुह्रदः शत्रवोऽमित्राः
लिए हुए पर-अन्य हैं, परन्तु मूढ़ प्राणी मोहनीयकर्मके जालमें फसकर इन्हें आत्माके समान
मानता है
विशदार्थस्व और परके विवेकज्ञानसे रहित पुरुष शरीर आदिक पर पदार्थोंको
आत्मा व आत्माके स्वरूप ही समझता रहता है अर्थात् दृढ़तम मोहसे वश प्राणी
देहादिकको (जो कि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव लक्षणरूप हरेक प्रकारसे आत्मस्वभावसे भिन्न
स्वभाववाले हैं) ही आत्मा मानता है और दृढ़तर मोहवाला प्राणी, उन्हीं व वैसे ही
शरीरादिकको आत्मा नहीं, अपि तु आत्माके समान मानता रहता है
।।।।
[मित्राणि ] मित्रो, [शत्रवः ] शत्रुओ [सर्वथा अन्य स्वभावानि ] सर्वथा (चैतन्यस्वभावथी) भिन्न
स्वभाववाळां छे, [किन्तु ] छतां [मूढः ] अज्ञानी जीव [तानि ] तेमने [स्वानि ] पोतानां
[प्रपद्यते ] माने छे.
टीका :माने छे (समजे छे). कोण ते? मूढ अर्थात् स्वपरना विवेकज्ञानथी
रहित पुरुष, कोने (माने छे)? शरीर, गृह आदि वस्तुओने; केवा प्रकारनी (माने छे)?
पोतानी (माने छे). स्व एटले निज आत्मा,
स्वानि एटले आत्मीय स्व. [एकशेष समासने
लीधे एक ‘स्व’ शब्दनो लोप थयो छे]. आनो अर्थ ए छे केद्रढतम मोहथी आविष्ट
(मोहाभिभूत) प्राणी देहादिकने आत्मा माने छे, एटले के तेमने आत्मस्वरूप समजे छे
अने द्रढत्तर मोहथी आविष्ट प्राणी (तेमने) आत्मीय (एटले आत्मानां) माने छे.
(शिष्य) पूछे छेकेवा प्रकारनी वस्तुओने पोतानी माने छे? सर्वथा (सर्व प्रकारे)
अन्य (भिन्न) स्वभाववाळी (वस्तुओने)अर्थात् द्रव्यक्षेत्रकाळभावरूप सर्व प्रकारे
स्वस्वभावथी अन्य एटले भिन्न जेनो स्वभाव छे तेवी (वस्तुओने). वळी पूछ्युं, ‘‘कई
कई (वस्तुओ)’’ प्रथम तो वपु एटले शरीर जे अचेतनत्वादि स्वभाववाळुं प्रसिद्ध छे ते,
तेम ज घर, धन, दारा, स्त्री (भार्या), पुत्रो (आत्मजो), मित्रो (सुहृदो) अने शत्रुओ
(अमित्रो) वगेरे.