कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ २५
पुनराचार्य एव प्राह – विराधक इत्यादि । यावत् ‘स्वभावमनासादयन्
विसदृशान्यवगच्छतीति’ — शरीरादीनां स्वरूपमलभमानः पुरुषः शरीरादीनि अन्यथाभूतानि
प्रतिपद्यत इत्यर्थः ।
अमुमेवार्थं स्फु टयति —
वपुर्गृहं धनं दाराः पुत्रा मित्राणि शत्रवः ।
सर्वथान्यस्वभावानि मूढः स्वानि प्रपद्यते ।।८।।
शरीर आदिकोंके स्वरूपको न समझता हुआ आत्मा शरीरादिकोंको किसी दूसरे
रूपमें ही मान बैठता है ।
इसी अर्थको आगेके श्लोकमें स्पष्टरीत्या विवेचित करते हैं —
पुत्र मित्र घर तन तिया, धन रिपु आदि पदार्थ ।
बिल्कुल निजसे भिन्न हैं, मानत मूढ़ निजार्थ ।।८।।
अर्थ — यद्यपि शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु आदि सब अन्य स्वभावको
उन्मत्त (पागल) बनी जाय छे, तेनुं ज्ञान पण मूर्छित थई जाय छे, तेने हेय – उपादेयनो
कांई पण विवेक रहेतो नथी, तेम आ व्यवहारी (अज्ञानी) आत्म स्वस्वरूपथी च्युत थाय
छे, तेने हेय – उपादेयनो कांई विवेक रहेतो नथी, ते पोतानाथी सर्वथा भिन्न धनादि
संपदामां तथा देह – स्त्री – पुत्र – मित्रादिकमां आत्मकल्पना करे छे — तेमने पोतानां माने छे
अने अत्यंत दुःखकर सांसारिक भोगोना भावने पण सुखकर माने छे. तेनुं ज्ञान, मोहथी
पराभव पामेलुं होवाथी, सुख – दुःख शरीरादि पदार्थोना यथार्थ स्वरूपने जाणतुं नथी —
अर्थात् पदार्थोने विपरीत स्वरूपे जाणे छे. ७
फरीथी आचार्य ज कहे छे — ‘विराधक इत्यादि यावत्’ — (दशमा श्लोक सुधी) पोताना
स्वभावने प्राप्त नहि करनार (अर्थात् शरीर वगेरेनुं स्वरूप नहि जाणनार) पुरुष
शरीरादिने अन्यथा (अन्य प्रकारे) माने छे – एवो अर्थ छे.
आ ज अर्थनी (आचार्य) स्पष्टता करे छे —
तन, धन, घर, स्त्री, मित्र – अरि, पुत्रादि सहु अन्य,
परभावोमां मूढ जन, माने तेह अनन्य. ८
अन्वयार्थ : — [वपुः ] शरीर, [गृहं ] घर, [धनं ] धन, [दाराः ] स्त्री, [पुत्राः ] पुत्रो,