कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ३७
जायदि जीवस्सेवं भावो संसारचक्कवालंमि ।
इदि जिणवरेहिं भणियं अणाइणिहणो सणिहणो वा ।।१३०।।
ग्रहण होता है, उससे फि र राग और द्वेष होने लग जाते हैं । इस प्रकार जीवका संसाररूपी
चक्रवालमें भवपरिणमन होता रहता है, ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है । जो अनादिकालसे होते
हुए अनन्तकाल तक होता रहेगा, हाँ किन्हीं भव्यजीवोंके उसका अन्त भी हो जाता
है ।’’ ।।११।।
‘ए प्रमाणे भाव, संसारचक्रमां जीवने अनादि – अनंत अथवा अनादि – सांत थया
करे छे — एम जिनवरोए कह्युं छे.’.......(१३०)
(ए स्निग्ध परिणाम अभव्य जीवोने अनादि – अनंत होय छे अने केटलाक भव्य
जीवोने ते अनादि – सांत होय छे एटले के ते परिणामनो अंत पण आवे छे.)
भावार्थ : — आ लोकमां ए कथा प्रसिद्ध छे के देवोए मंथराचल पर्वतने मंथन –
दंड बनावी बे नेतरांथी तेनी खेंचताण करी समुद्रनुं मंथन कर्युं, तेम आ जीव, द्रव्य – क्षेत्र –
काळ – भव – भावरूप – पंचपरावर्तनरूप – संसार – समुद्रमां अज्ञानजनित राग – द्वेषरूपी नेतरांनी
आकर्षण – क्रियाथी अनादिकाळथी घूमतो रह्यो छे.
कोई पण वस्तु इष्ट के अनिष्ट नथी छतां जे वस्तु इष्ट लागे छे तेमां ते राग
करे छे अने जे अनिष्ट लागे छे तेमां द्वेष करे छे. देहादि पदार्थोमां आत्मभ्रान्ति ते ज
राग – द्वेषनुं मूळकारण छे.
राग – द्वेष बंने शक्ति – व्यक्ति अपेक्षाए युगपत् (एकी साथे) होय छे. ज्यां एक
प्रति राग प्रगटरूपे (व्यक्तरूपे) होय, त्यां बीजा प्रत्ये द्वेष पण शक्तिरूपे होय ज. एम
बंनेनो परस्पर अविनाभावसंबंध छे.
राग – द्वेष बीजा अनेक दोषोनुं मूळ छे. तेनाथी मन अति विह्वळ अने चंचळ बने
छे.
वळी, संसारचक्रनुं मूळकारण मिथ्यात्व अने राग – द्वेष ज छे, कारण के तेना निमित्ते
कर्मबंध, कर्मबंधथी गति – प्राप्ति, गतिथी शरीर, शरीरथी इन्द्रियो, इन्द्रियोथी विषयग्रहण
अने विषयग्रहणथी राग – द्वेष अने वळी राग द्वेषथी कर्मबंध थाय छे – एम संसारचक्र चाल्या
ज करे छे. ११.