Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 21.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ६३
स्वसंवेदनसुव्यक्तस्तनुमात्रो निरत्ययः
अत्यन्तसौख्यवानात्मा लोकालोकविलोकनः ।।२१।।
टीकाअस्ति ! कोऽसौ ? आत्मा कीद्दशः, लोकालोकविलोकनः लोको
जीवाद्याकीर्णमाकाशं ततोऽन्यदलोकः तौ विशेषेण अशेषविशेषनिष्ठतया लोक्यते पश्यति
जानाति
एतेन ‘‘ज्ञानशून्यं चैतन्यमात्रमात्मा’’ इति सांख्यमतं, बुद्धयादिगुणोज्झितः पुमानिति
यौगमतं च प्रत्युक्तम् प्रतिध्वस्तश्च नैरात्म्यवादो बौद्धानाम् पुन कीदृशः ? अत्यन्तसौख्यवान्
निज अनुभवसे प्रगट है, नित्य शरीरप्रमान
लोकालोक निहारता, आतम अति सुखवान ।।२१।।
अर्थआत्मा लोक और अलोकको देखने जाननेवाला, अत्यन्त अनंत सुख
स्वभाववाला, शरीरप्रमाण, नित्य, स्वसंवेदनसे तथा कहे हुए गुणोंसे योगिजनों द्वारा अच्छी
तरह अनुभवमें आया हुआ है
विशदार्थजीवादिक द्रव्योंसे घिरे हुए आकाशको लोक और उससे अन्य सिफ र्
आकाशको अलोक कहते हैं इन दोनोंको विशेषरूपसे उनके समस्त विशेषोंमें रहते हुए
जो जाननेदेखनेवाला है, वह आत्मा है ऐसा कहनेसे ‘‘ज्ञानशून्यचैतन्यमात्रमात्मा’’ ज्ञानसे
शून्य सिफ र् चैतन्यमात्र ही आत्मा है, ऐसा सांख्यदर्शन तथा ‘‘बुद्ध्यादिगुणोज्झितः पुमान्’’
निज अनुभवथी प्रगट जे, नित्य शरीर प्रमाण,
लोकालोक विलोकतो, आत्मा अतिसुखवान. २१.
अन्वयार्थ :[आत्मा ] आत्मा [लोकालोकविलोकनः ] लोक अने अलोकनो ज्ञाता
द्रष्टा, [अत्यन्तसौख्यवान् ] अत्यन्तअनंतसुखस्वभाववाळो, [तनुमात्रः ] शरीर प्रमाण,
[निरत्ययः ] अविनाशी (नित्य) अने [स्वसंवेदनसुव्यक्तः अस्ति ] स्वसंवेदन द्वारा सारी रीते
व्यक्त (प्रगट) छे(अर्थात् स्वसंवेदनप्रत्यक्ष छे).
टीका :छे. कोण ते? आत्मा. केवो (आत्मा)? लोक अने अलोकनो ज्ञाता
द्रष्टाअर्थात् जीवादि द्रव्योथी व्याप्त आकाश ते लोक अने तेनाथी अन्य (आकाश) ते
अलोकते बंनेने विशेषरूपथी अर्थात् अशेषरूपे (कांई पण बाकी राख्या वगर) परिपूर्णरूपे
जे अवलोके छेदेखे छेजाणे छे, ते एनाथी (एम कहीने)
‘ज्ञानशून्यं चैतन्यमात्रमात्मा’
ज्ञानशून्य चैतन्यमात्र ज आत्मा छेएवा सांख्यमतनुं तथा
‘बुद्धयादिगुणोज्झितः पुमानिति’