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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
कुर्वन्तु । तदैहिकफलाभिलाषं त्यकत्वा आमुत्रिकफलसिद्धयर्थमेवात्मा ध्यातव्यः । उक्तं च
[तत्त्वानुशासने ] —
‘‘यद्धयानं रौद्रमार्त्तं वा यदैहिकफलार्थिनाम् ।
तस्मादेतत्परित्यज्य धर्म्यं शुक्लमुपास्यताम् ।।’’
अथैवमुद्वोधितश्रद्धानो विनेयः पृच्छति स आत्मा कीदृश इति यो
युष्माभिर्ध्यतव्यतयोपदिष्टः पुमान् स किंस्वरूप इत्यर्थः । गुरुराहः —
अभिलाषाको छोड़कर परलोक सम्बन्धी फलकी सिद्धि-प्राप्तिके लिये ही आत्माका ध्यान
करना चाहिए । कहा भी है कि, ‘‘यद् ध्यानं रौद्रमार्तं वा०’’ ।।२०।।
‘‘वह सब रौद्रध्यान या आर्त्तध्यान है, जो इसलोक सम्बन्धी फलके चाहनेवालेको
होता है । इसलिए रौद्र व आर्त्तध्यानको छोड़कर धर्मध्यान व शुक्लध्यानकी उपासना करनी
चाहिए ।’’
अब वह शिष्य जिसे समझाये जानेसे श्रद्धान उत्पन्न हो रहा है, पूछता है कि जिसे
आपने ध्यान करने योग्य रूपसे बतलाया है, वह कैसा है ? उस आत्माका क्या स्वरूप
है ? आचार्य कहते हैं —
फळनी सिद्धि माटे ज आत्मानुं ध्यान करवुं जोईए. ‘तत्त्वानुशासन’ – श्लोक. २२०मां कह्युं
छे के —
‘जे रौद्रध्यान अने आर्तध्यान छे ते आ लोक संबंधी फळनी इच्छा करनाराओने
होय छे. तेथी तेनो त्याग करीने धर्मध्यान अने शुक्लध्याननी उपासना करवी जोईए.’
भावार्थ : — एक बाजु चिन्तामणि रत्न छे अने बीजी बाजुए खोळनो टुकडो छे.
बन्नेनी प्राप्ति ध्यानथी थाय छे, परंतु ए बन्ने चीजोमांथी विवेकी पुरुष चिन्तामणि रत्ननो
ज आदर करशे; तेवी रीते धर्मी जीव, खोळना टुकडा समान आ लोक संबंधी पराधीन
इन्द्रियजनित सुख जे वास्तवमां दुःख छे तेनो आदर छोडी धर्म – शुक्लरूप ध्याननी
आराधना द्वारा चिन्तामणि समान वास्तविक आत्मिक सुखनी प्राप्ति करवानुं पसंद करशे.
माटे आर्त अने रौद्र – ए बन्ने ध्यानोनो परित्याग करी, आत्मस्वरूपनी प्राप्ति माटे
धर्म अने शुकल – ए बन्ने ध्यानोनी उपासना करवी जोईए. २०.
‘ध्यान करवा योग्य छे,’ एवो आपे जेनो उपदेश आप्यो छे ते आत्मानुं स्वरूप
शुं छे? एवो अर्थ छे. गुरु कहे छेः —