Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 20.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ६१
इतश्चिन्तामणिर्दिव्य इतः पिण्याकखण्डकम्
ध्यानेन चेदुभे लभ्ये क्वाद्रियन्तां विवेकिनः ।।२०।।
टीकाअस्ति कोऽसौ ? चिन्तामणि चिंतितार्थप्रदो रत्नविशेषः किं विशिष्टो ?
दिव्यो देवेनाधिष्ठितः क्व, इत अस्मिन्नेकस्मिन् पक्षे इतश्चान्यस्मिन् पक्षे पिण्याकखण्डकं
कुत्सितमल्पं वा खलखण्डकमस्ति एते च उभे द्वे अपि यदि ध्यानेन लभ्येते अवश्यं लभ्येते
तर्हि कथय क्व द्वयोर्मध्ये कतरस्मिन्नेकस्मिन् विवेकिनो लोभच्छेदविचारचतुरा आद्रियन्तां आदरं
इत चिंतामणि है महत, उत खल टूक असार
ध्यान उभय यदि देत बुध, किसको मानत सार ।।२०।।
अर्थइसी ध्यानसे दिव्य चिंतामणि मिल सकता है, इसीसे खलीकें टुकड़े भी
मिल सकते हैं जब कि ध्यानके द्वारा दोनों मिल सकते हैं, तब विवेकी लोक किस ओर
आदरबुद्धि करेंगे ?
विशदार्थएक तरफ तो देवाधिष्ठित चिन्तित अर्थको देनेवाला चिन्तामणि और
दूसरी ओर बुरा व छोटासा खलीका टुकड़ा, ये दोनों भी यदि ध्यानके द्वारा अवश्य मिल
जाते हैं, तो कहो, दोनोंमेंसे किसकी ओर विवेकी लोभके नाश करनेके विचार करनेमें
चतुर
पुरुष आदर करेंगे ? इसलिए इस लोक सम्बन्धी फल कायकी नीरोगता आदिकी
छे चिंतामणि दिव्य ज्यां, त्यां छे खोळ असार,
पामे बेउ ध्यानथी, बुध माने शुं सार? २०.
अन्वयार्थ :[इतः दिव्यः चिन्तामणिः ] एक बाजु दिव्य चिंतामणि छे, [इतः च
पिण्याकखण्डकम् ] अने बीजी बाजु खलीनो (खोळनो) टुकडो छे; [चेत् ] जो [ध्यानेन ] ध्यान
द्वारा [उभे ] बन्ने [लभ्ये ] मळी शके तेम छे, तो [विवेकिनः ] विवेकी जनो [क्व आद्रियन्ताम् ]
कोनो आदर करशे?
टीका :छे. कोण ते? चिन्तामणि अर्थात् चिन्तित पदार्थ देनार रत्नविशेष. केवो
(चिन्तामणि)? दिव्य अर्थात् देव द्वारा अधिष्ठित. क्यां? एक बाजुए एटले एक पक्षे
(चिंतामणि छे) अने बीजी बाजुए एटले बीजा पक्षे खराब वा हलको खलीनो (खोळनो)
टुकडो छे. ते बेउ
बन्ने पण जो ध्यानथी प्राप्त थायअवश्य मळी जायतो कहो
बन्नेमांथी कया एकमां, विवेकी जनो अर्थात् लोभनो नाश करवाना विचारमां चतुर पुरुषो,
आदर करशे? तेथी आ लोक संबंधी फळनी अभिलाषा छोडी परलोक संबंधी (लोकोत्तर)