Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अत्राह शिष्यः तर्हि कायस्योपकारश्चिन्त्यते इति भगवन् ! यद्येवं तर्हि ‘शरीरमाद्यं खलु
धर्मसाधनम्’ इत्यभिधानात्तस्यापायनिरासाय यत्नः क्रियते न च कायस्यापायनिरासो दुष्कर इति
वाच्यम् ध्यानेन तस्यापि सुकरत्वात् तथा चोक्तम् [तत्त्वानुशासने ]
‘‘यदात्रिकं फलं किंचित्फलमामुत्रिकं च यत्
एतस्य द्विगुणस्यापि ध्यानमेवाग्रकारणम्’’ ।।२१७।।
‘झाणस्स ण दुल्लहं किंपीति च’अत्र गुरुः प्रतिषेधमाह तन्नेति ध्यानेन
कायस्योपकारो न चिन्त्य इत्यर्थः
सेवनका मुख्य साधन-सहारा है इतना ही नहीं, उसमें यदि रोगादिक हो जाते हैं, तो
उनके दूर करनेके लिये प्रयत्न भी किये जाते हैं कायके रोगादिक अपायोंका दूर किया
जाना मुश्किल भी नहीं है, कारण कि ध्यानके द्वारा वह (रोगादिकका दूर किया जाना)
आसानीसे कर दिया जाता है, जैसा कि तत्त्वानुशासनमें कहा है
‘‘यत्रादिकं फलं
किंचित् ।।१९।।
जो इस लोक सम्बन्धि फल हैं, या जो कुछ परलोक सम्बन्धी फल हैं, उन दोनों ही
फलोंका प्रधान कारण ध्यान ही है मतलब यह है कि ‘‘झाणस्स ण दुल्लहं किं पीति च’’
ध्यानके लिये कोई भी व कुछ भी दुर्लभ नहीं है, ध्यानसे सब कुछ मिल सकता है इस विषयमें
आचार्य निषेध करते हैं, कि ध्यानके द्वारा कायका उपकार नहीं चिंतवन करना चाहिए
माटे समजवुं के धनादिक द्वारा जीवने लेशमात्र उपकार थतो नथी, जीवनो उपकार
तो निश्चय आत्मधर्मथी ज थाय छे. १९.
अहीं शिष्य कहे छेत्यारे शरीरना उपकार संबंधी विचार करवामां आवे छे,
भगवन्! जो एम होय तो, ‘शरीर खरेखर धर्मनुं आद्य साधन छे’ए कथनथी तेनो
(रोगादिथी) नाश थतो अटकाववाने प्रयत्न करवामां आवे छे अने शरीरना (रोगादिक)
अपायोने (बाधाओने) दूर करवा पण मुश्केल नथी
एम वाच्य छे, कारण के ध्यान द्वारा ते
(रोगादिकनुं दूर करवुं) सहेलाईथी कराय छे; तथा ‘तत्त्वानुशासन’ श्लोक २१७मां कह्युं छे के
‘जे आ लोक संबंधी फळ छे अने जे परलोक संबंधी फळ छेते बंने फळोनुं प्रधान
कारण ध्यान ज छे.’ ‘ध्यानने माटे कांईपण दुर्लभ नथी.’
आ विषयमां आचार्य निषेध करी कहे छे‘तेम नथी; ध्यान द्वारा शरीरनो उपकार
चिंतववो जोईए नहि’एवो अर्थ छे.