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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अत्राह शिष्यः । तर्हि कायस्योपकारश्चिन्त्यते इति भगवन् ! यद्येवं तर्हि ‘शरीरमाद्यं खलु
धर्मसाधनम्’ इत्यभिधानात्तस्यापायनिरासाय यत्नः क्रियते । न च कायस्यापायनिरासो दुष्कर इति
वाच्यम् । ध्यानेन तस्यापि सुकरत्वात् । तथा चोक्तम् [तत्त्वानुशासने ] —
‘‘यदात्रिकं फलं किंचित्फलमामुत्रिकं च यत् ।
एतस्य द्विगुणस्यापि ध्यानमेवाग्रकारणम्’’ ।।२१७।।
‘झाणस्स ण दुल्लहं किंपीति च’ — अत्र गुरुः प्रतिषेधमाह तन्नेति । ध्यानेन
कायस्योपकारो न चिन्त्य इत्यर्थः ।
सेवनका मुख्य साधन-सहारा है । इतना ही नहीं, उसमें यदि रोगादिक हो जाते हैं, तो
उनके दूर करनेके लिये प्रयत्न भी किये जाते हैं । कायके रोगादिक अपायोंका दूर किया
जाना मुश्किल भी नहीं है, कारण कि ध्यानके द्वारा वह (रोगादिकका दूर किया जाना)
आसानीसे कर दिया जाता है, जैसा कि तत्त्वानुशासनमें कहा है — ‘‘यत्रादिकं फलं
किंचित्० ।।१९।।
जो इस लोक सम्बन्धि फल हैं, या जो कुछ परलोक सम्बन्धी फल हैं, उन दोनों ही
फलोंका प्रधान कारण ध्यान ही है । मतलब यह है कि ‘‘झाणस्स ण दुल्लहं किं पीति च’’
ध्यानके लिये कोई भी व कुछ भी दुर्लभ नहीं है, ध्यानसे सब कुछ मिल सकता है । इस विषयमें
आचार्य निषेध करते हैं, कि ध्यानके द्वारा कायका उपकार नहीं चिंतवन करना चाहिए —
माटे समजवुं के धनादिक द्वारा जीवने लेशमात्र उपकार थतो नथी, जीवनो उपकार
तो निश्चय आत्मधर्मथी ज थाय छे. १९.
अहीं शिष्य कहे छे — त्यारे शरीरना उपकार संबंधी विचार करवामां आवे छे,
भगवन्! जो एम होय तो, ‘शरीर खरेखर धर्मनुं आद्य साधन छे’ — ए कथनथी तेनो
(रोगादिथी) नाश थतो अटकाववाने प्रयत्न करवामां आवे छे अने शरीरना (रोगादिक)
अपायोने (बाधाओने) दूर करवा पण मुश्केल नथी – एम वाच्य छे, कारण के ध्यान द्वारा ते
(रोगादिकनुं दूर करवुं) सहेलाईथी कराय छे; तथा ‘तत्त्वानुशासन’ श्लोक २१७मां कह्युं छे के —
‘जे आ लोक संबंधी फळ छे अने जे परलोक संबंधी फळ छे – ते बंने फळोनुं प्रधान
कारण ध्यान ज छे.’ ‘ध्यानने माटे कांईपण दुर्लभ नथी.’
आ विषयमां आचार्य निषेध करी कहे छे — ‘तेम नथी; ध्यान द्वारा शरीरनो उपकार
चिंतववो जोईए नहि’ — एवो अर्थ छे.