कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ५९
टीका — यदनशनादितपोऽनुष्ठानं जीवस्य पूर्वापूर्वपापक्षणनिवारणाभ्यामुपकाराय
स्यात्तद्देहस्यापकारकं ग्लान्यादिनिमित्तत्वात् । यत्पुनर्घनादिकं देहस्य भोजनाद्युपयोगेन
क्षुधाद्युपतापक्षयत्वादुपकाराय स्यात्तज्जीवस्योपार्जनादौ पापजनकत्वेन दुर्गति दुःखनिमित्तत्वाद-
पकारकं स्यादतो जानीहि जीवस्य धनादिना नोपकारगन्धोप्यस्ति धर्मस्यैव तदुपकारत्वात् ।
विशदार्थ — देखो जो अनशनादि तपका अनुष्ठान करना, जीवके पुराने व नवीन
पापोंको नाश करनेवाला होनेके कारण, जीवके लिये उपकारक है, उसकी भलाई करनेवाला
है, वही आचरण या अनुष्ठान शरीरमें ग्लानि शिथिलतादि भावोंको कर देता है, अतः उसके
लिए अपकारक है, उसे कष्ट व हानि पहुँचानेवाला है । और जो धनादिक हैं, वे
भोजनादिकके उपयोग द्वारा क्षुधादिक पीड़ाओंको दूर करनेमें सहायक होते हैं । अतः वे
शरीरके उपकारक हैं । किन्तु उसी धनका अर्जनादिक पापपूर्वक होता है । व पापपूर्वक
होनेसे दुर्गतिके दुःखोंकी प्राप्तिके लिये कारणीभूत है । अतः वह जीवका अहित या बुरा
करनेवाला है । इसलिए यह समझ रक्खो कि धनादिकके द्वारा जीवका लेशमात्र भी उपकार
नहीं हो सकता । उसका उपकारक तो धर्म ही है । उसीका अनुष्ठान करना चाहिए ।
अथवा कायका हित सोचा जाता है, अर्थात् कायके द्वारा होनेवाले उपकारका विचार
किया जाता है । देखिये कहा जाता है कि ‘‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’’ शरीर धर्म-
टीका : — जे अनशनादि तपनुं अनुष्ठान, जीवनां जूनां अने नवां पापोनो नाश
करवामां तथा दूर करवामां कारणभूत होवाथी जीवने उपकारक छे, ते (तपादि आचरण)
देहने ग्लानि आदिनुं कारण होवाथी अपकारक छे; अने वळी जे धनादिक, भोजनादिकना
उपयोग द्वारा क्षुधादि पीडाने नाश करवानुं कारण होवाथी शरीरने उपकारक छे, ते (धनना)
उपार्जनादिकमां पाप उत्पन्न थतुं होवाथी अने ते पाप दुर्गतिना दुःखनुं कारण होवाथी,
जीवने अपकारक छे. माटे धनादिक द्वारा जीवने उपकारनी गंध पण नथी, किन्तु धर्मनो
ज तेना उपर उपकार छे, एम जाण.
भावार्थ : निश्चय अनशनादि तपना अनुष्ठानथी जूनां तथा नवां कर्मोनो अभाव
थाय छे, तेथी ते जीवने उपकारक छे, परंतु ते तपादिना अनुष्ठानथी शरीरमां शिथिलतादि
उत्पन्न थाय छे, तेथी शरीरने ते अपकारक (अहितकर) छे.
भोजनादिना भोग द्वारा क्षुधादि पीडाओने दूर करवामां धनादिक निमित्त छे, तेथी
शरीरने उपकारक छे, परंतु ते धन कमावामां पाप थाय छे अने पापथी दुर्गतिनां दुःखोनी
प्राप्ति थाय छे, तेथी धनादिक जीवने अपकारक – अहितकर छे.