Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ६५
‘‘वेद्यत्वं वेदकत्वं च यत्स्वस्य स्वेन योगिनः
तत्स्वसंवेदनं प्राहुरात्मनोऽनुभवं दृशम् ।।१६१।।’’
इत्येवंलक्षणस्वसंवेदनप्रत्यक्षेण सकलप्रमाणधुर्येण सुष्ठु उक्तैश्च गुणैः संपूर्णतया व्यक्तः
विशदतयानुभूतो योगिभि त्वेकदेशेन
कहे हुए विशेषणोंसे किसका और कैसा गुणवाद ? ऐसी शंका होने पर आचार्य कहते हैं
कि वह आत्मा ‘स्वसंवेदन
सुव्यक्त है,’ स्वसंवेदन नामक प्रमाणके द्वारा अच्छी तरह प्रगट
है ‘‘वेद्यत्वं वेदकत्वं च’’
‘‘जो योगीको खुदका वेद्यत्व व खुदके द्वारा वेदकत्व होता है, बस, वही स्वसंवेदन
कहलाता है अर्थात् उसीको आत्माका अनुभव व दर्शन कहते हैं अर्थात् जहाँ आत्मा
ही ज्ञेय और आत्मा ही ज्ञायक होता है, चैतन्यकी उस परिणतिको स्वसंवेदन प्रमाण कहते
हैं
उसीको आत्मानुभव व आत्मदर्शन भी कहते हैं इस प्रकारके स्वरूपवाले स्वसंवेदन-
प्रत्यक्ष (जो कि सब प्रमाणोंमें मुख्य या अग्रणी प्रमाण है) से तथा कहे हुए गुणोंसे
सम्पूर्णतया प्रकट वह आत्मा योगिजनोंको एकदेश विशदरूपसे अनुभवमें आता है
’’ २१।।
ते आत्मा ‘स्वसंवेदनसुव्यक्तः’ स्वसंवेदन द्वारा सारी रीते व्यक्त छे (अर्थात् आत्मा
स्वसंवेदनप्रत्यक्ष छे), तेथी ते संभवे छे.
‘तत्त्वानुशासन’श्लो. १६१मां कह्युं छे के
‘योगीने पोताना आत्मानुं आत्मा द्वारा जे वेद्यपणुं तथा वेदकपणुं छे, तेने
स्वसंवेदन कहे छे. ते आत्मानो अनुभव वा दर्शन छे.’
आवा प्रकारना लक्षणवाळो स्वसंवेदनप्रत्यक्ष आत्मा जे सर्व प्रमाणोमां मुख्य आ
अग्रणी प्रमाण छे, तेनाथी तथा उक्त गुणोथी सारी रीते संपूर्णपणे व्यक्त (प्रगट) छे,
ते योगीओने एकदेश विशदरूपथी अनुभववामां आवे छे.
भावार्थ :आ श्लोकमां आचार्ये, (१) लोकअलोकने जाणनार, (२) अत्यंत
अनन्तसुखस्वभाववाळो, (३) शरीर प्रमाण, (४) अविनाशी अने (५) स्वसंवेदनगम्य
आत्मानां आवां पांच विशेषणो आपी आत्मानी विशिष्ठता दर्शावी छे. तेनी स्पष्टता आ
प्रमाणे छेः
(१) सर्वज्ञनो आत्मा लोकालोकने जाणे छे. ए व्यवहारनयनुं कथन छे, पण तेनो
अर्थ ए नथी के तेओ जाणता ज नथी. तेओ जाणे तो छे, परंतु पर पदार्थोनी साथे एकता