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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
करी (एकमेक थई) जाणता नथी. जो तेओ एकता करी जाणे तो तेओ अन्य जीवोना राग –
द्वेषना कर्ता अने ते जीवोना सुख – दुःखना भोक्ता थाय – जे कदी बने नहि.
दर्पणनी जेम आत्मामां (ज्ञानमां) एवी निर्मळता छे के त्रण लोकना सर्व पदार्थो
तेमां प्रतिबिंबित थाय छे. तेथी पोताना आत्माने जाणतां बधा पदार्थो तेमां जणाई जाय
छे.
केवळज्ञाननी एक समयनी पर्याय, त्रण लोकना अनंत पदार्थो, तेमना प्रत्येकना
अनंत – अनंत गुणो अने दरेक गुणनी त्रिकालवर्ती अनंत – अनंत पर्यायोने, युगपत् (एकी
साथे) जेम छे तेम जाणे छे; अर्थात् जे द्रव्यनी जे पर्याय जे काले जे क्षेत्रे थई गई होय,
थवानी होय अने थती होय तेम ज ते ते पर्यायोने अनुकूळ जे जे बाह्य निमित्तो होय,
ते बधांने केवळी भगवान एकी साथे जेम छे तेम जाणे छे. एवुं तेमना ज्ञाननुं अचिन्त्य
सामर्थ्य छे.
सर्वज्ञनी शक्ति विषे श्री प्रवचनसारमां कह्युं छे केः —
‘‘.....हवे, एक ज्ञायकभावनो सर्व ज्ञेयोने जाणवानो स्वभाव होवाथी, क्रमे प्रवर्तता,
अनंत, भूत – वर्तमान – भावि विचित्र पर्यायसमूहवाळां, अगाधस्वभाव अने गंभीर एवां
समस्त द्रव्यमात्रने – जाणे के ते द्रव्यो ज्ञायकमां कोतराई गयां होय, चीतराई गयां होय, दटाई
गयां होय, खोदाई गयां होय, डूबी गयां होय, समाई गयां होय, प्रतिबिंबित थयां होय एम –
एक क्षणमां ज जे (शुद्ध आत्मा) प्रत्यक्ष करे छे......’’ (गाथा २०० – टीका)
‘‘ते (जीवादि) द्रव्य जातिओना समस्त विद्यमान अने अविद्यमान पर्यायो,
तात्कालिक (वर्तमान) पर्यायोनी माफक, विशिष्टतापूर्वक (पोतपोताना भिन्न – भिन्न स्वरूपे)
ज्ञानमां वर्ते छे. (गाथा – ३७)
‘‘जे (पर्यायो) अद्यापि उत्पन्न थया नथी तथा जे उत्पन्न थईने विलय पामी गया
छे, ते (पर्यायो) खरेखर अविद्यमान होवा छतां, ज्ञान प्रति नियत होवाथी (ज्ञानमां
निश्चित – स्थिर – चोंटेलां होवाथी, ज्ञानमां सीधां जणातां होवाथी) ज्ञानप्रत्यक्ष वर्तता थका,
पत्थरना स्तंभमां कोतराएला भूत अने भावि देवोनी (तीर्थंकरदेवोनी) माफक पोतानुं स्वरूप
अकंपपणे (ज्ञानने) अर्पता एवा (ते पर्यायो) विद्यमान ज छे.’’ (गाथा – ३८ टीका)
‘‘.....आ रीते आत्मानी अद्भूत ज्ञानशक्ति अने द्रव्योनी अद्भुत ज्ञेयत्वशक्तिने
लीधे केवळज्ञानमां समस्त द्रव्योना त्रणे काळना पर्यायोनुं एक ज समये भासवुं अविरुद्ध
छे.’’ (गा. ३७ – भावार्थ)