कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ६७
अत्राह शिष्यः यद्येवमात्मास्ति तस्योपास्तिः कथमिति स्पष्टम् आत्मसेवोपायप्रश्नोऽयम् ।
यहाँ पर शिष्य कहता है कि यदि इस तरहका आत्मा है तो उसकी उपासना कैसे
की जानी चाहिए ? इसमें आत्मध्यान या आत्मभावना करनेके उपायोंको पूछा गया है ।
(२) आत्मा अनंतसौख्यवान छे एटले के आत्माना द्रव्यस्वभावमां अतीन्द्रिय
अनंत सुख छे. आवुं परिपूर्ण सुख सर्वज्ञ भगवानने ज होय, १कारण के
(१) घातिकर्मोना अभावने लीधे, (२) परिणाम (परिणमन) कोई उपाधि नही होवाथी
अने (३) केवळज्ञान निष्कंप – स्थिर – अनाकुळ होवाने लीधे, केवळज्ञान सुखस्वरूप ज छे,
जोके आत्माने संसार - अवस्थामां कर्म साथे संबंध होवाथी ते गुण विभावरूप
परिणमे छे, ते वास्तविक सुखरूप परिणमतो नथी, परंतु ज्यारे आत्मा घातिकर्मथी सर्वथा
मुक्त थाय छे अर्थात् स्वात्मोपलब्धिने प्राप्त करे छे, त्यारे ते गुणनो पूर्ण विकास थतां
आत्मा अनंतसुखस्वभावरूप परिणमे छे.
(३) व्यवहारनयथी आ जीव नामकर्मप्राप्त देह प्रमाण छे, परंतु निश्चयनयथी ते
लोकाकाश प्रमाण असंख्यातप्रदेशी छे. जोके व्यवहारनयथी ते प्रदेशोना संकोचविस्तार सहित
छे. तोपण सिद्ध अवस्थामां संकोच – विस्तारथी रहित शरीर प्रमाणे तेनो आकार छे.२
(४) द्रव्यार्थिकनयथी आत्मा टंकोत्कीर्ण ज्ञानना अखंड स्वभावे ध्रुव छे — अविनाशी
छे, परंतु पर्यायार्थिकनये ते उत्पाद – व्यय सहित छे, अर्थात् प्रतिक्षण विनाशिक छे.
(५) आत्मा स्वसंवेदनगम्य छे. ‘अहं अस्मि’ हुं छुं एवा अन्तर्मुखाकाररूपथी जे
ज्ञान अथवा अनुभव थाय छे, तेनाथी आत्मानी सत्ता स्वतःसिद्ध थाय छे. ज्ञानीजनने
अन्तर्बाह्य जल्पो अथवा संकल्पोनो परित्याग करी आत्मस्वरूपनुं आत्मा द्वारा आत्मामां ज
जे अनुभव या वेदन थाय छे, ते स्वसंवेदन छे. आ स्वसंवेदननी अपेक्षाए आत्मा प्रत्यक्ष
छे.
ज्यां आत्मा ज ज्ञेय अने आत्मा ज ज्ञायक होय छे, त्यां चैतन्यनी ते परिणतिने
स्वसंवेदन प्रमाण कहे छे. तेने आत्मानुभव या आत्मदर्शन पण कहे छे. २१.
अहीं शिष्य कहे छे के जो आत्मा आवा प्रकारनो छे, तो तेनी उपासना केवी रीते
करवी जोईए? आत्म – उपासनाना उपायनो आ प्रश्न छे – ए स्पष्ट छे.
१. जुओ, श्री प्रवचनसार – गु. आवृत्ति गा. ६० भावार्थ.
२. जुओ, श्री परमात्मप्रकाशक – गा. ४३/
२ भावार्थ अने द्रव्यसंग्रह गाथा – १०.