Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 22.

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६८ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
गुरुराह
संयम्य करणग्राममेकाग्रत्वेन चेतसः
आत्मानमात्मवान्न् ध्यायेदात्मनैवात्मनि स्थितम् ।।२२।।
टीकाध्यायेत् भावयेत् कोऽसौ ? आत्मवान् गुप्तेन्द्रियमना ध्वस्तस्वायत्तवृतिर्वा
कं ? आत्मानं यथोक्तस्वभावं पुरुषम् केन ? आत्मनैव स्वसंवेदनरूपेण स्वेनैव तज्ज्ञप्तौ
करणान्तराभावात्
आचार्य कहते हैं
मनको कर एकाग्र, सब इन्द्रियविषय मिटाय
आतमज्ञानी आत्ममें, निजको निजसे ध्याय ।।२२।।
अर्थमनकी एकाग्रतासे इन्द्रियोंको वशमें कर ध्वस्त-नष्ट कर दी है, स्वच्छन्द
वृत्ति जिसने ऐसा पुरुष अपनेमें ही स्थित आत्माको अपने ही द्वारा ध्यावे
विशदार्थजिसने इन्द्रिय और मनको रोक लिया है अथवा जिसने इन्द्रिय और
मनकी उच्छृंखला एवं स्वैराचाररूप प्रवृत्तिको ध्वस्त कर दिया है, ऐसा आत्मा जिसका
स्वरूप पहिले (नं
२१ के श्लोकमें) बता आये हैं, आत्माको आत्मासे ही यानी स्वसंवेदनरूप
आचार्य कहे छेः
इन्द्रियविषयो निग्रही, मन एकाग्र लगाय,
आत्मामां स्थित आत्मने, ज्ञानी निजथी ध्याय. २२
अन्वयार्थ :[चेतसः ] (भाव) मननी [एकाग्रत्वेन ] एकाग्रताथी [करणग्रामं ]
इन्द्रियोना समूहने [संयम्य ] वश करी [आत्मवान् ] आत्मवान् पुरुषे [आत्मनि ] पोतानामां
(आत्मामां) [स्थितं ] स्थित [आत्मानं ] आत्माने [आत्मना एव ] आत्मा द्वारा ज [ध्यायेत् ]
ध्यावो जोईए.
टीका :ध्याववो जोईएभाववो जोईए. कोणे? आत्मवान् (पुरुषे) अर्थात्
जेणे इन्द्रियो अने मनने गोपवेल छे. (संयममां राखेल छे) अथवा जेणे इन्द्रियो अने
मननी स्वैराचाररूप (स्वच्छंद) प्रवृत्तिनो नाश करी दीधो छे एवा आत्माए. कोने
(ध्याववो)? आत्माने एटले जेनो स्वभाव पहेलां (श्लोक २१मां) बताव्यो छे तेवा पुरुषने
(आत्माने); शा वडे? आत्मा वडे ज अर्थात् स्वसंवेदनरूप पोताथी ज (प्रत्यक्ष ज्ञानथी ज)