कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ६९
उक्तं च [तत्त्वानुशासने ] —
स्वपरज्ञप्तिरूपत्वात् न तस्य करणान्तरम् ।
ततश्चिन्तां परित्यज्य स्वसंवित्यैव वेद्यताम् ।।१६२।।
क्व तिष्ठन्तमित्याह, आत्मनि स्थितं, वस्तुतः सर्वभावानां स्वरूपमात्राधारत्वात् । किं
कृत्वा ? संयम्य रूपादिभ्यो व्यावृत्य । किं ? करणग्रामं चक्षुरादीन्द्रियगणम् । केनोपायेन ?
एकाग्रत्वेन एकं विवक्षितमात्मानं तद् द्रव्यं पर्यायो वा अग्रं प्राधान्येनालम्बनं विषयो यस्य अथवा
प्रत्यक्ष ज्ञानसे ही ध्यावे, कारण कि स्वयं आत्मामें ही उसकी ज्ञप्ति (ज्ञान) होती है । उस
ज्ञप्तिमें और कोई करणान्तर नहीं होते । जैसा कि तत्त्वानुशासनमें कहा है —
‘‘स्वपरज्ञप्तिरूपत्वात्०’’
‘‘वह आत्मा स्वपर-प्रतिभासस्वरूप है । वह स्वयं ही स्वयंको जानता है, और परको
भी जानता है । उसमें उससे भिन्न अन्य करणोंकी आवश्यकता नहीं है । इसलिए चिन्ताको
छोड़कर स्वसंवित्ति-स्वसंवेदनके द्वारा ही उसे जानो, जो कि खुदमें ही स्थित है । कारण
कि परमार्थसे सभी पदार्थ स्वरूपमें ही रहा करते हैं । इसके लिए उचित है कि मनको
एकाग्र कर चक्षु आदिक इन्द्रियोंकी अपने-अपने विषयों (रूप आदिकों)से व्यावृत्ति करे ।’’
यहाँ पर संस्कृतटीकाकार पंडित आशाधरजीने ‘एकाग्र’ शब्दके दो अर्थ प्रदर्शित किये हैं ।
(ध्याववो जोईए), कारण के ते ज्ञप्तिमां बीजा करण (साधन)नो अभाव छे. (स्वयं आत्मा
ज ज्ञप्तिनुं साधन छे.)
‘तत्त्वानुशासन’ — श्लोक १६२मां कह्युं छे केः —
‘ते आत्मा स्व – पर ज्ञप्तिरूप होवाथी (अर्थात् ते स्वयं स्वने अने परने पण
जाणतो होवाथी तेने (तेनाथी भिन्न) अन्य करणनो (साधननो) अभाव छे. माटे चिंताने
छोडी स्वसंवित्ति (एटले स्वसंवेदन) द्वारा ज तेने जाणवो जोईए.’
(शिष्ये) पूछ्युं — क्यां रहेला (आत्माने)? आत्मामां स्थित (थयेलाने), कारण के
वस्तुतः (वास्तविक रीते) सर्व पदार्थोने स्वरूपमात्र ज आधार छे (अर्थात् सर्व पदार्थो
पोतपोताना स्वरूपमां ज स्थित होय छे). शुं करीने? रूपादि (विषयो)थी रोकीने (संयमित
करीने) अर्थात् पाछी वाळीने. कोने? इन्द्रियोना समूहने – एटले चक्षु आदि इन्द्रिय – गणने.
कया उपायथी? एकाग्रपणाथी — अर्थात् एक एटले विवक्षित आत्मा ते द्रव्य वा पर्याय –
ते अग्र एटले प्रधानपणे अवलंबनभूत विषय छे, जेनो — ते एकाग्र;