कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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तथा च [समाधितंत्रे ] — प्रच्याव्य विषयेभ्योऽहं मां मयैव मयि स्थितम् ।
बोधात्मानं प्रपन्नोऽस्मि परमानन्दनिर्वृतम् ।।३२।।
है । इसी तरह यह भी भावना करे कि जैसा कि पूज्यपादस्वामीके समाधिशतकमें कहा
है — ‘‘प्राच्याव्य विषयेभ्योऽहं०’’
‘‘मैं इन्द्रियोंके विषयोंसे अपनेको हटाकर अपनेमें स्थित ज्ञानस्वरूप एवं
परमानन्दमयी आपको अपने ही द्वारा प्राप्त हुआ हूँ ।।२२।।
‘हुं इन्द्रियोना विषयोथी हठावी पोतानामां स्थित ज्ञानस्वरूप तथा परमानंदमयी
आत्माने आत्मा द्वारा प्राप्त थयो छुं.’
भावार्थ : — प्रथम श्रुतज्ञान द्वारा आत्माने जाणवो, पछी आत्मामां एकाग्र थवाथी
इन्द्रियोनी बाह्य प्रवृत्ति स्वयं अटकी जशे अर्थात् तेमनी स्वच्छंद प्रवृत्तिनो नाश थशे अने ते
एकाग्रताथी अन्य चिंतानो निरोध थई ध्यानावस्थामां स्वसंवेदन द्वारा आत्मानो अनुभव
थशे.
‘‘जे ज्ञान पांच इन्द्रिय अने छठ्ठा मन द्वारा प्रवर्ततुं हतुं, ते ज्ञान सर्व बाजुथी
समेटाई निर्विकल्प अनुभवमां केवळ स्वरूपसन्मुख थयुं, केम के आ ज्ञान क्षयोपशमरूप छे.
ते एक काळमां एक ज्ञेयने ज जाणी शके. हवे ते ज ज्ञान स्वरूप जाणवाने प्रवर्त्युं त्यारे
अन्यने जाणवानुं सहेज ज बंध थयुं. त्यां एवी दशा थई के बाह्य अनेक शब्दादिक विकार
होवा छतां पण स्वरूपध्यानीने तेनी कांई खबर नथी. ए प्रमाणे मतिज्ञान पण स्वरूपसन्मुख
थयुं. वळी नयादिकना विचारो मटवाथी श्रुतज्ञान पण स्वरूपसन्मुख थयुं......तेथी जे ज्ञान
इन्द्रियो अने मन द्वारा प्रवर्ततुं हतुं ते ज ज्ञान हवे निज अनुभवमां प्रवर्ते छे, तथापि
आ ज्ञानने अतीन्द्रिय कहीए छीए१.’’
आत्मा स्व – पर प्रतिभासस्वरूप छे अर्थात् स्व – पर प्रकाशक छे. ते स्वयं पोताने
जाणतां पर जणाई जाय छे, तेथी जाणवा माटे तेने बीजां करणोनी (साधनोनी) आवश्यकता
रहेती नथी.
स्व – संवेदनमां ज्ञप्ति – क्रियानी निष्पत्ति माटे बीजुं कोई करण अथवा साधकतम हेतु
नथी, कारण के आत्मा स्वयं स्व – पर ज्ञप्तिरूप छे. माटे कारणान्तरनी (बीजा कारणनी)
चिंता छोडी स्व – ज्ञप्ति द्वारा ज आत्माने जाणवो जोईए. २२
१. मोक्षमार्ग प्रकाशक — गु. आ. श्री टोडरमल्लजीनी रहस्यपूर्ण चिठ्ठी – पृ. ३४५.