Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 23.

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७२ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अथाह शिष्यः ! आत्मोपासनया किमिति भगवन्नात्मसेवनया किं प्रयोजनं स्यात् ?
फलप्रतिपत्तिपूर्वकत्वात् प्रेक्षावत्प्रवृत्तेरितिपृष्टः सन्नाचष्टे :
अज्ञानोपास्तिरज्ञानं ज्ञानं ज्ञानिसमाश्रयः
ददाति यत्तु यस्मास्ति सुप्रसिद्धमिदं वचः ।।२३।।
टीकाददाति कासौ, अज्ञानस्य देहादेर्मूढभ्रान्तसंदिग्धगुर्वादेर्वा उपास्तिः सेवा किं ?
यहाँ पर शिष्यका कहना है कि भगवन् ! आत्मासे अथवा आत्माकी उपासना करनेसे
क्या मतलब सधेगाक्या फल मिलेगा ? क्योंकि विचारवानोंकी प्रवृत्ति तो फलज्ञानपूर्वक हुआ
करती है, इस प्रकार पूछे जाने पर आचार्य जवाब देते हैं
अज्ञभक्ति अज्ञानको, ज्ञानभक्ति दे ज्ञान
लोकोक्ती जो जो धरे, करे सो ताको दान ।।२३।।
अर्थअज्ञान कहिये ज्ञानसे रहित शरीरादिककी सेवा अज्ञानको देती है, और
ज्ञानी पुरुषोंकी सेवा ज्ञानको देती है यह बात प्रसिद्ध है, कि जिसके पास जो कुछ होता
है, वह उसीको देता है, दूसरी चीज़ जो उसके पास है नहीं, वह दूसरेको कहाँसे देगा ?
विशदार्थअज्ञान शब्दके दो अर्थ हैं, एक तो ज्ञान रहित शरीरादिक और दूसरे
पछी शिष्य पूछे छे‘भगवन्! आत्मानी उपासनानुं प्रयोजन शुं?
अर्थात् आत्मानी सेवाथी शो मतलब सरे? कारण के विचारवानोनी प्रवृत्ति तो फळज्ञानपूर्वक
होय छे.
एवी रीते पूछवामां आवतां आचार्य कहे छेः
अज्ञभक्ति अज्ञानने, ज्ञानभक्ति दे ज्ञान,
लोकोक्ति‘जे जे धरे, करे ते तेनुं दान.’ २३.
अन्वयार्थ :[अज्ञानोपास्ति ] अज्ञाननी (अर्थात् ज्ञानरहित शरीरादिनी) उपासना
(सेवा) [अज्ञानं ददाति ] अज्ञान आपे छे (अर्थात् अज्ञाननी उपासनाथी अज्ञाननी प्राप्ति
थाय छे), [ज्ञानिसमाश्रयः ] अने ज्ञानीनी सेवा [ज्ञानं ददाति ] ज्ञान आपे छे (अर्थात् ज्ञानी
पुरुषोनी सेवाथी ज्ञाननी प्राप्ति थाय छे). [यत् तु यस्य अस्ति तद् एव ददाति ] जेनी पासे
जे होय छे ते ज आपे छे, [इदं सुप्रसिद्धं वचः ] ए सुप्रसिद्ध वात छे.
टीका :आपे छे. कोण ते? अज्ञाननी उपासनाअर्थात् अज्ञान एटले