कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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अज्ञानं, मोहभ्रमसन्देहलक्षणं तथा ददाति । कासौ ? ज्ञानिनः स्वभावस्यात्मनो ज्ञानसंपन्नगुर्वादेर्वा
समाश्रयः । अनन्यपरया सेवनम् । किं ? ज्ञानं स्वार्थावबोधम् ।
उक्तं च —
ज्ञानमेव फलं ज्ञाने ननु श्लाध्यमनश्वरम् ।
अहो मोहस्य माहात्म्य मन्यदप्यत्र मृग्यते ।।
मिथ्याज्ञान (मोह-भ्रांति-संदेह)वाले मूढ़-भ्रांत तथा संदिग्ध गुरु आदिक । सो इनकी उपासना
या सेवा अज्ञान तथा मोह-भ्रमव संदेह लक्षणात्मक मिथ्याज्ञानको देती है । और ज्ञानी
कहिये, ज्ञानस्वभाव आत्मा तथा आत्मज्ञानसम्पन्न गुरुओंकी तत्परताके साथ सेवा,
स्वार्थावबोधरूप ज्ञानको देती है । जैसा कि श्री गुणभद्राचार्यने आत्मानुशासनमें कहा है —
‘‘ज्ञानमेव फलं ज्ञाने०’’
ज्ञान होनेका फल, प्रशंसनीय एवं अविनाशी ज्ञानका होना ही है, यह निश्चयसे
जानो । अहो ! यह मोहका ही माहात्म्य है, जो इसमें ज्ञानको छोड़ कुछ और ही फल
ढूँढ़ा जाता है । ज्ञानात्मासे ज्ञानकी ही प्राप्ति होना न्याय है । इसलिए हे भद्र ! ज्ञानीकी
उपासना करके प्रगट हुई है स्व पर विवेकरूपी ज्योति जिसको ऐसा आत्मा, आत्माके द्वारा
आत्मामें ही सेवनीय है, अनन्यशरण होकर भावना करनेके योग्य है ।’’ ।।२३।।
शरीरादिसंबंधी मिथ्या भ्रान्ति अथवा संदिग्ध (अज्ञानी) गुरु आदिक तेनी उपासना —
सेवा. शुं (आपे छे)? अज्ञानने अर्थात् मोह – भ्रम – संदेहलक्षणवाळा अज्ञानने
(मिथ्याज्ञानने); तथा आपे छे, कोण ते? ज्ञानीनी – अर्थात् ज्ञानस्वभाव आत्मानी वा
आत्मज्ञानसंपन्न गुरु आदिनी – सेवा अर्थात् अनन्यपराथी (तत्परताथी) सेवा. शुं. (आपे
छे)? ज्ञान अर्थात् स्वार्थावबोधलक्षणवाळुं ज्ञान (आपे छे).
श्री गुणभद्राचार्ये ‘आत्मानुशासन’ श्लो – १७५मां कह्युं छे केः —
‘ज्ञाननुं (ज्ञाननी उपासनानुं) फळ, प्रशंसनीय अविनाशी सम्यक्ज्ञान ज छे. ए
निश्चयथी जाणो. अहो! ए मोहनुं ज माहात्म्य छे के (ज्ञानने छोडी) अहीं पण (एटले
आ उपासनामां पण) बीजुं शोधे छे.’
शिष्य पूछे छे — आ बाबतमां शुं द्रष्टान्त छे?
आचार्य कहे छे — ‘यत्तु यस्यास्ति तदेव ददाति ।’ एनो अर्थ ए छे के जेनी पासे जे
होय ते ज आपे छे — अर्थात् जेने स्वाधीन जे छे, ते तेनी उपासना करवामां आवतां आपे