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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
को अत्र दृष्टान्त इत्याह यदित्यादि ददातीत्यत्रापि योज्यं ‘तुं अवधारणे’ तेनायमर्थः
संपद्यते । यद्येव यस्य स्वाधीनं विद्यते स सेव्यमानं तदेव ददातीत्येतद्वाक्यं लोके सुप्रतीतमतो
भद्र ज्ञानिनमुपास्य समुजृम्भितस्वपरविवेकज्योतिरजस्रमात्मानमात्मनि सेवस्व ।
अत्राप्याह शिष्यः । ज्ञानिनोध्यात्मस्वस्थस्य किं भवतीति निष्पन्नयोग्यपेक्षया स्वात्मध्यान-
फलप्रश्नोयम् ।
गुरुराह —
परीषहाद्यविज्ञानादास्रवस्य निरोधिनी ।
जायतेऽध्यात्मयोगेन कर्मणामाशु निर्जरा ।।२४।।
यहाँ फि र भी शिष्य कहता है कि अध्यात्मलीन ज्ञानीको क्या फल मिलता है ?
इसमें स्वात्मनिष्ठ योगीकी अपेक्षासे स्वात्मध्यानका फल पूछा गया है । आचार्य कहते हैं —
परिषहादि अनुभव बिना, आतम-ध्यान प्रताप ।
शीघ्र ससंवर निर्जरा, होत कर्मकी आप ।।२४।।
छे. आ वाक्य लोकमां सुप्रतीत छे. तेथी हे भद्र! ज्ञानीनी उपासना करीने प्रगट थई छे,
स्व-पर विवेकरूपी ज्योति जेनी एवा आत्माने आत्मा द्वारा आत्मामां ज निरंतर सेव.
भावार्थः — अज्ञानीनी उपासना करवाथी अज्ञाननी अने ज्ञानीनी उपासना
करवाथी ज्ञाननी प्राप्ति थाय छे, कारण के जेनी पासे जे होय ते ज प्राप्त थाय. माटे जेने
स्व – परना भेदविज्ञाननी ज्योति प्रगट थई छे, तेणे आत्मानी आत्मा वडे आत्मामां ज
निरंतर उपासना करवी योग्य छे. २३.
अहीं, वळी शिष्य कहे छे – अध्यात्मलीन ज्ञानीने शुं थाय छे (शुं फळ मळे छे)?
निष्पन्न (स्वात्मनिष्ठ) योगीनी अपेक्षाए स्वात्मध्यानना फळनो आ प्रश्न छे.
आचार्य कहे छेः —
आत्मध्यानना योगथी, परीसहो न वेदाय,
शीघ्र ससंवर निर्जरा, आस्रव – रोधन थाय. २४.
अन्वयार्थ : — [अध्यात्मयोगेन ] अध्यात्मयोगथी (आत्मामां आत्माना [परीषहाद्य-
विज्ञानात् ] परीषहादिकनो (मनुष्य, तिर्यंच, देवादिना घोर उपसर्गो अथवा कष्टो आदिनो)