कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ७५
टीका — जायते भवति । कासौ ? निर्जरा एकदेशेन संक्षयो विश्लेष इत्यर्थः । केषां ?
कर्मणां सिद्धयोग्यपेक्षयाऽशुभानां च शुभानां साध्ययोग्यपेक्षया त्वसद्वेद्यादीनां कर्मणाम् । कथमाशु
सद्यः। केन ? अध्यात्मयोगेन आत्मन्यात्मनः प्रणिधानेन, किं केवला ? नेत्याह — निरोधिनी
प्रतिषेधयुक्ता, कस्यास्रवस्यागमनस्य कर्मणामित्यत्रापि योज्यम् । कुत इत्याह, परीषहाणां
क्षुधादिदुःखभेदानामादिशब्दाद्देवादिकृत्तोपसर्गबाधानां चाविज्ञानादसंवेदनात् ।
तथा चोक्तम् —
अर्थ — आत्मामें आत्माके चिंतवनरूप ध्यानसे परीषहादिकका अनुभव न होनेसे
कर्मोंके आगमनको रोकनेवाली कर्म-निर्जरा शीघ्र होती है ।
विशदार्थ — अध्यात्मयोगसे आत्मामें आत्माका ही ध्यान करनेसे कर्मोंकी निर्जरा
(एकदेशसे कर्मोंका क्षय हो जाना, कर्मोंका सम्बन्ध छूट जाना) हो जाती है । उसमें भी
जो सिद्धयोगी हैं, उनके तो अशुभ तथा शुभ दोनों ही प्रकारोंके कर्मोंकी निर्जरा हो जाती
है । और जो साध्ययोगी हैं, उनके असातावेदनीय आदि अशुभ कर्मोंकी निर्जरा होती है ।
कोरी निर्जरा होती हो सो बात नहीं है । अपि तु भूख-प्यास आदि दुःखके भेदों (परीषहों)
अनुभव (वेदन) नहि होवाथी (उपसर्गादि तरफ लक्ष नहि होवाथी) [आस्रवस्य ]
(कर्मोना) आस्रवने (आगमनने) [निरोधिनी ] रोकवावाळी [कर्मणां निर्जरा ] कर्मोनी निर्जरा
[आशु ] शीघ्र [जायते ] थाय छे.
टीका : — थाय छे. कोण ते? निर्जरा अर्थात् (कर्मोनो) एकदेश संक्षयविश्लेष
अथवा संबंध छूटवो ते (खरी पडवुं ते) एवो अर्थ छे. कोनी (निर्जरा)? कर्मोनी;
सिद्धयोगीनी अपेक्षाए (अर्थात् जे सिद्धयोगी छे तेनां तो) अशुभ तथा शुभ कर्मोनी
निर्जरा अने साध्ययोगीनी अपेक्षाए असातावेदनीय आदिनी निर्जरा थाय छे. केवी
रीते? शीघ्र – जलदी. शा वडे? अध्यात्मयोग द्वारा एटले आत्मामां आत्माना ध्यानथी.
शुं केवल (निर्जरा थाय छे)? (गुरुए) कह्युं, ‘‘ना, ‘निरोधिनी शब्द प्रतिषेध (निषेध)
बतावे छे.’’ कोनो (प्रतिषेध)? आस्रवनो – कर्मोना आगमननो, एम अहीं समजवुं.
कह्युं, ‘शाथी’? परीषहोनो – अर्थात् क्षुधा आदि दुःखना भेदोरूप परीषहोनो तथा
‘आदि’ शब्दथी देवो वगेरेथी करेला उपसर्गनी बाधानो अनुभव (वेदन) नहि होवाथी
(बाधा तरफ उपयोग नहि होवाथी) अथवा तेनुं संवेदन नहि होवाथी (कर्मोना
आगमनने आस्रवने रोकवारूप) जूनां कर्मनी निर्जरा साथे संवर पण थाय छे.
वळी ‘आत्मानुशासन’ — श्लोक २४६मां कह्युं छे केः —