Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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छे तथा कोईने अंशावतार कहे छे. हवे पूर्णावतार थतां ब्रह्म अन्य ठेकाणे व्यापी रह्यो छे
के नहि? जो व्यापी रह्यो छे तो आ अवतारोने तुं पूर्णावतार शा माटे कहे छे? तथा जो
नथी व्यापी रह्यो तो एटलो ज मात्र ब्रह्म रह्यो. वळी अंशावतार थयो त्यां ब्रह्मनो अंश
तो तुं सर्वत्र कहे छे, तो आमां अधिकता शुं थई? वळी तुच्छ कार्य माटे ब्रह्मे पोते अंशावतार
धार्यो कहे छे, तेथी जणाय छे के अवतार धार्या विना ब्रह्मनी शक्ति ए कार्य करती नहोती.
कारण के
जे कार्य अल्प उद्यमथी थाय त्यां घणो उद्यम शा माटे करीए?
वळी ए अवतारोमां मच्छ कच्छादि अवतार थया, पण किंचित् कार्य करवा माटे हीन
तिर्यंचपर्यायरूप ब्रह्म थयो. पण ए केम संभवे? प्रह्लाद माटे नरसिंह अवतार थयो पण
हिरणाकश्यपने एवो थवा ज केम दीधो? अने केटलाक काळ सुधी पोताना भक्तने शा माटे दुःख
अपाव्युं? तथा विरूप (कदरूपो) स्वांग शा माटे धर्यो? तेओ नाभिराजाने त्यां वृषभावतार थयो
बतावे छे. नाभिराजाने पुत्रपणानुं सुख उपजाववा माटे अवतार धारण कर्यो तो तेणे घोर
तपश्चरण शा माटे कर्युं ? तेने तो कांई साध्य हतुं ज नहि. तुं कहीश के
‘‘जगतने बताववा
माटे एम कर्युं.’’ तो कोई अवतार तपश्चरण बतावे, कोई अवतार भोगादिक बतावे, कोई
अवतार क्रोधादिक प्रगट करे तथा कोई कुतूहल मात्र नाचे, तो तेमां जगत कोने भलो जाणे?
वळी ते कहे छे के‘‘एक ‘अरहंत’ नामनो राजा थयो तेणे वृषभावतारनो मत
अंगीकार करी जैनमत प्रगट कर्यो.’’ पण जैनमां तो कोई ‘अरहंत’ नामनो राजा थयो नथी.
त्यां तो सर्वज्ञपद पामी पूजवा योग्य होय तेनुं ज नाम अर्हंत् छे.
वळी तेओ राम अने कृष्ण ए बे ज अवतारोने मुख्य कहे छे. पण रामावतारे शुं
कर्युं? सीताने माटे विलाप करी रावणथी लडी तेने मारी राज्य कर्युं. तथा कृष्णावतारे पहेलां
गोवाळ थई परस्त्री गोपिकाओने माटे नाना प्रकारनी विपरीत निंद्य चेष्टा करी, पछी जरासंघ
आदिने मारी राज्य कर्युं. पण एवां कार्यो करवाथी शुं सिद्धि थई?
रामकृष्णादिनुं तेओ एक स्वरूप कहे छे. तो वच्चेना एटला काळ सुधी तेओ क्यां
रह्या? जो ब्रह्ममां रह्या तो त्यां जुदा रह्या के एक रह्या? जो जुदा रह्या तो जणाय छे
के
तेओ ब्रह्मथी जुदा ज ठर्या. तथा एक रहे छे तो राम पोते ज कृष्ण थया अने सीता
पोते ज रुक्मिणी थई इत्यादि केवी रीते कहो छो?
वळी तेओ रामावतारमां तो सीताने मुख्य कहे छे, तथा कृष्णावतारमां ए ज सीताने
रुक्मिणी थई कहे छे. हवे तेने तो प्रधानरूप न कहेतां राधिकाकुमारीने मुख्य कहे छे. त्यां
पूछीए छीए त्यारे केम कहे छे के
‘‘राधिका भक्त हती.’’ पण पोतानी स्त्रीने छोडी एक
दासीने मुख्य करवी केम बने? वळी कृष्णने तो राधिका सहित परस्त्रीसेवननां सर्वविधान थयां,
पण ए भक्ति केवी? एवां कार्य तो महानिंद्य छे. वळी रुक्मिणीने छोडी राधिकाने मुख्य
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ ११३