न थया परंतु अन्य गोपीओ
स्वरूप कहे छे. हवे तेमां ते आसक्त थया त्यारे ते मायामां ज आसक्त थया केम न कहेवाय?
बहु क्यां सुधी कहीए? तेओ जे निरूपण करे छे ते बधुं विरुद्ध करे छे. परंतु जीवोने
भोगादिकनी वात गमे छे तेथी तेमनुं कहेवुं वहालुं लागे छे.
कहे छे, पण तेणे योग शा माटे ग्रहण कर्यो? मृगछाला अने भस्म धारण करे छे ते शा
माटे धारण करे छे? ते रुंडमाला पहेरे छे. हवे ज्यारे हांडकांने अडकवुं पण निंद्य छे. तो
तेने गळामां शा माटे धारण करे छे? सर्पादिक सहित छे, अने आंकडो
छे पण योगी बनी जोडे स्त्री राखे छे एवुं विपरीतपणुं तेणे शा माटे कर्युं? जो कामासक्त
हता तो घरमां ज रहेवुं हतुं! तथा नानाप्रकारे तेणे विपरीत चेष्टाओ करी तेनुं प्रयोजन तो
कांई जणातुं नथी, मात्र बहावरा जेवुं कर्तव्य देखाय छे छतां तेने तेओ ब्रह्मस्वरूप कहे छे.
विचारता ज नथी. कोई एक अंग वडे संसारी जीवने महंत माने अने तेने ज ब्रह्मनुं स्वरूप
पण कहे तो ‘‘ब्रह्म सर्वव्यापी छे’’ एवुं विशेषण शा माटे आपो छो? ‘सूर्यादिकमां वा
सुवर्णादिकमां पण ब्रह्म छे;’’ हवे सूर्य अजवाळुं करे छे अने सुवर्ण धन छे इत्यागि गुणो
वडे तेमां ब्रह्म मान्यो, तो सूर्यनी माफक दीपादिक पण अजवाळुं करे छे तथा सुवर्णनी माफक
रूपुं, लोखंड आदि पण धन छे, इत्यादि गुण अन्य पदार्थोमां पण छे तो तेमने पण ब्रह्म
मानो! तेमने नाना