वळी तेओ ज्वाला मालिनी आदि अनेक देवीओने मायानुं स्वरूप कही हिंसादिक पाप
ऊपजावी तेनुं पूजन ठरावे छे. पण माया तो निंद्य छे, तेनुं पूजन केम संभवे? तथा हिंसादिक
करतां भलुं केम थाय? गाय, सर्पादिक अभक्ष्य – भक्षणादिसहित पशुने तेओ पूज्य कहे छे;
अग्नि, पवन अने जळादिकने देव ठरावी तेने पूज्य कहे छे, तथा वृक्षादिकने पण कल्पित
युक्ति बनावी पूज्य कहे छे.
घणुं शुं कहीए? पुरुषलिंगी नाम सहित जे होय तेमां तो ब्रह्मनी कल्पना करी तथा
स्त्रीलिंगी नाम सहित जे होय तेमां मायानी कल्पना करी तेओ अनेक वस्तुओनुं पूजन ठरावे
छे. एमने पूजवाथी शुं फळ थशे, तेनो पण कांई विचार नथी. मात्र जूठां लौकिक प्रयोजनरूप
कारणो ठरावी तेओ जगतने भमावे छे.
वळी तेओ कहे छे के — ‘‘विधाता शरीरने घडे छे, यम मारे छे, मरती वेळा यमना
दूत लेवा आवे छे, मर्या पछी मार्गमां घणो काळ लागे छे, त्यां पुण्य – पापना हिसाब लेवाय
छे तथा त्यां दंडादिक दे छे.’’ पण ए बधी कल्पित जूठी युक्ति छे. कारण के – समय समय
अनंत जीवो ऊपजे छे अने मरे छे, ते सर्वनुं युगपत् केवी रीते आ प्रकारे संभवे? अने
एम मानवा माटे कोई कारण पण भासतुं नथी.
वळी तेओ मरण पछी श्राद्धादिकवडे तेनुं भलुं थवुं कहे छे, पण जीवतां तो कोईनां
पुण्य – पापवडे कोई बीजो सुखी – दुःखी थतो देखातो ज नथी, तो मरण पछी केवी रीते थशे?
मात्र मनुष्योने भमावी पोतानो लोभ साधवा माटे तेओ आवी युक्तिओ बनावे छे.
कीडी, पतंग अने हिंसादिक जीव पण ऊपजे – मरे छे तेमने तेओ प्रलयना जीव ठरावे
छे. पण जेम मनुष्यादिकने जन्म – मरण थतां जोईए छीए, ते ज प्रमाणे तेमने पण थतां
जोईए छीए. मात्र जूठी कल्पना करवाथी शुं सिद्धि छे?
वळी तेओ शास्त्रोमां कथादिकनुं निरूपण करे छे, त्यां पण विचार करतां विरुद्धता ज
भासे छे.
✾ यज्ञमां पशुवधाथी धार्मकल्पना – पशुहिंसानो निषेधा ✾
वळी तेओ यज्ञादिक करवामां धर्म ठरावे छे. यज्ञमां मोटा जीवोनो होम करे छे,
अग्नि – काष्ठादिकनो महाआरंभ करे छे अने तेमां जीवघात थाय छे. हवे तेमनां ज शास्त्रोमां
वा लोकमां हिंसानो तो निषेध छे, परंतु तेओ एवा निर्दय छे के – ए बधुं कांई गणता ज
नथी. तेओ कोई कहे छे के – ‘‘यज्ञार्थं पशवः सृष्टाः अर्थात् यज्ञ माटे ज पशु बनाव्यां छे, तेथी
त्यां घात करवानो कांई दोष नथी.’’
वळी मेघ आदिनुं थवुं, शत्रु आदिनो विनाश थवो, इत्यादि फळ बतावी तेओ पोताना
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ ११५