कारण के – एक ज पदार्थमां पोतापणुं मानवुं अने परपणुं पण मानवुं एम बंने केवी रीते
संभवे? माटे भ्रम छोडी निर्णय करवो योग्य छे.
वळी कोई नाम ज जपे छे, पण जेनुं ते नाम जपे छे तेनुं स्वरूप ओळख्या विना
केवळ नाम ज जपवुं केवी रीते कार्यकारी थाय? तुं कहीश के – ‘‘नामनो एवो अतिशय छे.’’
तो जे नाम ईश्वरनुं छे ते ज नाम कोई पापी पुरुषनुं धर्युं होय तो त्यां बंनेनां नाम
उच्चारणमां फळनी तो समानता थई? पण एम केवी रीते बने? माटे पहेलां स्वरूपनो निर्णय
करी पछी भक्ति करवा योग्य होय तेनी भक्ति करवी.
ए प्रमाणे निर्गुणभक्तिनुं स्वरूप दर्शाव्युं. हवे सगुण भक्ति कहीए छीए.
ज्यां काम क्रोधादिजन्य कार्योना वर्णनवडे, स्तुति आदि करवामां आवे तेने तेओ
सगुणभक्ति कहे छे.
ए सगुणभक्तिमां जेम लौकिक शृंगारपूर्वक नायक – नायिकानुं वर्णन करीए छीए, तेम
तेओ ठाकोर – ठकुराणीनुं वर्णन करे छे, त्यां स्वस्त्री – परस्त्री संबंधी संयोग – वियोगरूप सर्व
व्यवहार निरूपण करे छे. स्नान करती स्त्रीओनां वस्त्र चोरवां, दहीं लूंटवुं, स्त्रीओना चरणे
पडवुं अने स्त्रीओनी आगळ नाचवुं इत्यादि कार्यो के – जे करतां संसारी जीवो लज्जा पामे
तेवां कार्यो करवां तेओ ठरावे छे. पण एवां कार्यो तो अति कामनी पीडा थतां ज बने.
वळी युद्धादिक कार्य कर्यां कहे छे, पण ए क्रोधनां कार्य छे, पोतानो महिमा बताववा
माटे उपाय कर्या कहे छे, पण ए माननां कार्य छे. अनेक छळ कर्यां कहे छे. पण ए मायानां
कार्य छे. विषयसामग्रीनी प्राप्ति अर्थे प्रयत्न कर्यां कहे छे, पण ए लोभनां कार्य छे, तथा
कुतूहलादिक कार्यो कर्यां कहे छे, पण ए हास्यादिकनां कार्य छे, ए प्रमाणे ए बधां कार्यो
क्रोधादियुक्त थतां ज बने.
ए प्रमाणे काम – क्रोधादिथी उत्पन्न थयेलां कार्योने प्रगट करी कहे छे के – ‘‘अमे स्तुति
करीए छीए.’’ हवे जो काम – क्रोधादिजन्य कार्यो ज स्तुतियोग्य थतां होय तो निंद्य कार्य क्यां
ठरशे? जेनी लोकमां अने शास्त्रमां अत्यंत निंदा होय ते ज कार्योनुं वर्णन करी स्तुति करवी
ए तो हस्तचुगल जेवुं कार्य थयुं.
अमे पूछीए छीए के — कोईनुं नाम कह्या विना आवां कार्योनुं ज निरूपण करी कोई
तेमने कहे के – ‘‘फलाणाए आवां कार्यो कर्यां’’ तो तेने तमे भला जाणशो के बूरो? जो भलो
जाणशो तो पापी भला थया पण बूरो कोण थयो, तथा बूरो जाणशो तो एवां कार्य कोई
पण करो, परंतु ए बूरो ज थयो. पक्षपात रहित न्याय करो?
जो पक्षपातपूर्वक कहेशो के — ‘‘ठाकोरजीनुं एवुं वर्णन करवुं ए पण स्तुति छे’’ तो
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ ११७