तुं कहीश के — ‘‘त्यां मननो विकल्प मटी सुख ऊपजे छे, अने यमने वशीभूतपणुं थतुं
नथी.’’ पण ए मिथ्या छे. जेम निद्रामां चेतनानी प्रवृत्ति मटे छे तेम पवनसाधनाथी अहीं
चेतनानी प्रवृत्ति मटे छे. त्यां मनने रोकी राख्युं छे; पण कांई वासना तो मटी नथी, तेथी त्यां
मननो विकल्प मट्यो न कहेवाय, अने चेतना विना सुख कोण भोगवे छे? तेथी सुख ऊपज्युं
न कहेवाय. वळी ए साधनावाळा तो आ क्षेत्रमां थया छे, तेमां कोई अमर देखाता नथी. अग्नि
लगावतां तेनुं मरण थतुं देखाय छे, माटे ते ‘‘यमना वशीभूत नथी’’ ए कल्पना जूठी छे.
वळी ज्यां साधनामां कंईक चेतना रहे अने त्यां साधनाथी शब्द सांभळे तेने ते
‘‘अनाहत’’ शब्द बतावे छे. ते तो जेम वीणादिकना शब्द सांभळवाथी सुख मानवुं थाय छे,
तेम तेना सांभळवाथी सुख मानवा जेवुं छे. ए तो मात्र विषयनुं पोषण थयुं, पण परमार्थ
तो कांई पण न ठर्यो. वळी पवनना नीकळवा – पेसवामां ‘‘सोहं’’ एवा शब्दनी कल्पना करी
तेने तेओ ‘अजपा जाप’ कहे छे, पण ते तो जेम तेतरना शब्दमां ‘तुं ही’ शब्दनी कल्पना
करे छे, कांई अर्थने अवधारी ए तेतर एवो शब्द कहेतुं नथी. तेम अहीं ‘‘सोहं’’ शब्दनी
कल्पना छे. कांई पवन अर्थने अवधारी एवो शब्द रहेतो नथी. वळी शब्दने जपवा –
सांभळवाथी ज कांई फळप्राप्ति नथी, पण अर्थ अवधारवाथी फलप्राप्ति थाय छे.
‘‘सोहं’’ शब्दनो तो ए अर्थ छे के – ‘‘ते हुं छुं.’’ हवे अहीं एवी अपेक्षा जोईए
के – ‘‘ते’’ कोण? तेनो निर्णय करवो जोईए. कारण के – ‘‘तत्’’ शब्दने अने ‘‘यत्’’ शब्दने
नित्यसंबंध छे. तेथी वस्तुनो निर्णय करी तेमां अहंबुद्धि धारवामां ‘‘सोहं’’ शब्द बने छे.
त्यां पण ज्यां पोताने पोतारूप अनुभवे छे, त्यां तो ‘‘सोहं’’ शब्द संभवतो नथी, पण अन्यने
पोतानुं स्वरूप बताववामां ‘‘सोहं’’ शब्द संभवे छे. जेम कोई पुरुष पोताने पोतारूप जाणे
त्यां ते ‘‘ते हुं छुं’ एवुं शा माटे विचारे? पण कोई अन्य जीव के जे पोताने न ओळखतो
होय, तथा कोई पोतानुं लक्षण न ओळखतो होय, त्यारे तेने एम कहेवाय के – ‘‘जे आवो
छे ते हुं छुं.’’ ए ज प्रमाणे अहीं जाणवुं.
वळी कोई ललाट, भ्रमर अने नासिकाना अग्रभाग देखवाना साधनवडे त्रिकूटी आदिनुं
ध्यान थयुं कही परमार्थ माने छे. त्यां नेत्रनी पूतळी फरवाथी कोई मूर्तिक वस्तु दीठी एमां
शुं सिद्धि छे? वळी एवां साधनोथी किंचित् भूत – भविष्यादिकनुं ज्ञान थाय, वचनसिद्ध थाय,
पृथ्वी – आकाशादिकमां गमनादिकनी शक्ति उत्पन्न थाय, वा शरीरमां आरोग्यादिक थाय, तोपण
ए बधां लौकिक कार्यो छे. देवादिकमां एवी शक्ति स्वयं होय छे, तेनाथी कांई पोतानुं भलुं
थतुं नथी, पण भलुं तो विषयकषायनी वासना मटतां ज थाय छे. अने ए तो विषय – कषाय
पोषवाना उपाय छे; एथी ए बधां साधन कांई पण हितकारी नथी. एमां कष्ट घणुं छे,
मरणादि सुधी पण थई जाय छे अने हित सधातुं नथी, माटे ज्ञानी पुरुष एवो व्यर्थ खेद
करता नथी. कषायी जीवो ज एवा साधनमां लागे छे.
१२२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
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