माने छे. वळी आत्मा बे प्रकारना कहे छे, पण तेनुं निरूपण पहेलां कर्युं छे. मन कोई जुदो
पदार्थ नथी. भावमन तो ज्ञानरूप छे अने ते आत्मानुं स्वरूप छे, तथा द्रव्यमन परमाणुओनो
पिंड छे अने ते शरीरनुं अंग छे. ए प्रमाणे ए द्रव्यो कल्पित जाणवां.
द्वेष, स्निग्ध, गुरुत्व अने द्रव्यत्व. हवे तेमां स्पर्शादिक गुण तो परमाणुओमां होय छे, परंतु
पृथ्वीने गंधवती ज कहेवी, तथा जळने शीतस्पर्शवान कहेवुं, इत्यादि मिथ्या छे. कारण के
के
छे, कांई वस्तुमां तो नथी, पण अन्य पदार्थनी अपेक्षाए अन्य पदार्थना हीनाधिकपणाने जाणवा
माटे पोताना ज्ञानमां संख्यादिकनी कल्पनावडे विचार करीए छीए. वळी बुद्धि आदि छे ते
आत्मानुं परिणमन छे. त्यां ‘बुद्धि नाम तो ज्ञाननुं छे. अने ते आत्मानो ज गुण छे, तथा
‘मन’ नाम छे, पण तेने तो द्रव्योमां कह्युं ज हतुं, तो अहीं तेने गुण शा माटे कह्यो? वळी
सुखादिक छे, ते आत्मामां कदाचित् ज होय छे, तेथी ए गुण आत्माना लक्षणभूत तो नथी,
पण अव्याप्तपणाथी लक्षणाभास छे. स्निग्धादि तो पुद्गलपरमाणुमां होय छे, अने स्निग्ध,
गुरुत्व इत्यादि तो स्पर्शनइन्द्रियवडे जाणीए छीए, तेथी स्पर्शनगुणमां गर्भित थया, जुदां शा
माटे कहो छो? वळी द्रव्यत्वगुण जळमां कह्या, पण एम तो अग्नि आदिमां पण ऊर्ध्वगमनत्व
आदि होय छे, तो कां तो ए बधा कहेवा हता, अगर तो सामान्यमां गर्भित कहेवा हता?
ए प्रमाणे ए गुणो कह्या ते पण कल्पित छे.
होती नथी, चेष्टा तो घणा ज प्रकारनी थाय छे. वळी एमने जुदी तत्त्वसंज्ञा कही, पण कां
तो जुदा पदार्थ होय तो तेने जुदां तत्त्व कहेवां हतां, अगर कां तो काम
होय तो पाषाणादिकनी पण अनेक अवस्थाओ थाय छे, तो तेने पण कह्या करो, पण तेथी कांई
साध्य नथी.