रागादिक सहित छे, माटे ते सुलिंग नथी.
ए प्रमाणे शिवमतनुं निरूपण कर्युं. हवे मीमांसकमतनुं स्वरूप कहीए छीए.
✾ मीमांसकमत — निराकरण ✾
मीमांसकना बे प्रकार छेः — ब्रह्मवादी अने कर्मवादी.
तेमां ब्रह्मवादी तो ‘आ सर्व ब्रह्म छे, बीजुं कांई नथी’’ — ए प्रमाणे वेदांतमां
अद्वैतब्रह्मने निरूपण करे छे. तेओ ‘‘आत्मामां लीन थवुं ते मुक्ति’’ कहे छे. एनुं मिथ्यापणुं
पूर्वे दर्शाव्युं छे ते विचारवुं.
तथा कर्मवादी – क्रिया, आचार अने यज्ञादिक कार्योना कर्तव्यपणाने प्ररूपण करे छे, पण
ए क्रियाओमां रागादिकनो सद्भाव होवाथी ए कार्यो कोई कार्यकारी नथी.
वळी त्यां ‘‘भट्ट’’ अने ‘‘प्रभाकर’’ वडे करेली बे पद्धति छे. तेमां भट्ट तो प्रत्यक्ष,
अनुमान, वेद, उपमा, अर्थापत्ति अने अभाव ए छ प्रमाण माने छे अने प्रभाकर अभाव
विना पांच ज प्रमाण माने छे, पण तेनुं सत्यासत्यपणुं जैनशास्त्रोथी जाणवुं.
वळी त्यां षट्कर्म सहित, ब्रह्मसूत्रना धारक अने शूद्रअन्नादिकना त्यागी, गृहस्थाश्रम
छे नाम जेनुं, एवा भट्ट छे, तथा वेदांतमां यज्ञोपवीत रहित, विप्रअन्नादिकना ग्राहक अने
भागवत छे नाम जेमनुं, तेमना चार प्रकार छे — कुटीयर, बहूदक, हंस अने परमहंस. हवे
ए कंईक त्याग वडे संतुष्ट थया छे, परंतु ज्ञान – श्रद्धाननुं मिथ्यापणुं अने रागादिकनो सद्भाव
तेमने होय छे, तेथी ए वेष कार्यकारी नथी.
✾ जैमिनीयमत – निराकरण ✾
जैमिनीयमतमां एम कहे छे के — ‘‘सर्वज्ञदेव कोई छे नहि; वेदवचन नित्य छे; तेनाथी
यथार्थ निर्णय थाय छे; माटे पहेलां वेदपाठ वडे क्रियामां प्रवर्तवुं एवुं, ‘‘नोदना’’ (प्रेरणा) छे
लक्षण जेनुं, एवा धर्मनुं साधन करवुं. जेम कहे छे के — ‘‘स्वःकामोऽग्नि यजेत् – स्वर्गाभिलाषी
अग्निने पूजे,’’ इत्यादि तेओ निरूपण करे छे.
अहीं पूछीए छीए के – शैव, सांख्य, नैयायिकादिक बधा वेदने माने छे, अने तमे पण
मानो छो, तो तमारा अने तेओ बधाना तत्त्वादिक निरूपणमां परस्पर विरुद्धता देखाय छे,
तेनुं शुं कारण? वेदमां ज कोई ठेकाणे कंई अने कोई ठेकाणे कंई निरूपण कर्युं, तो तेनी प्रमाणता
केवी रीते रही? तथा जो मतवाळा ज एवुं निरूपण करे छे, तमे परस्पर झघडी, निर्णय करी,
एकने वेदना अनुसार तथा अन्यने वेदथी विरुद्ध ठरावो. अमने तो एम भासे छे के – वेदमां
ज पूर्वापर विरुद्धता सहित निरूपण छे, तेथी तेनो पोतपोतानी इच्छानुसार अर्थ ग्रहण करी
१३२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक