Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Bauddha Mat Nirakaran.

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जुदाजुदा मतना अधिकारी थया छे. हवे एवा वेदने प्रमाण केवी रीते मानीए? वळी अग्नि
पूजवाथी स्वर्ग थाय, पण अग्निने मनुष्यथी उत्तम केम मानीए? ए तो प्रत्यक्षविरुद्ध छे. ए
स्वर्गदाता केवी रीते होय? ए ज प्रमाणे अन्य वेदवचन पण प्रमाणविरुद्ध छे. वळी वेदमां
ब्रह्म कह्यो छे, तो सर्वज्ञ केम मानता नथी? इत्यादि प्रकारथी जैमिनीयमत कल्पित जाणवो.
बौद्धमतनिराकरण
बौद्धमतमां चार आर्यसत्य प्ररूपण करे छेदुःख, आयतन, समुदाय अने मार्ग. त्यां
संसारीने बंधरूप ते दुःख छे. तेना पांच प्रकार छेविज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार अने रूप.
रूपादिकने जाणवुं ते विज्ञान छे, सुखदुःखने अनुभववुं ते वेदना छे, सूतेलानुं जागवुं
ते संज्ञा छे, भणेलाने याद करवुं ते संस्कार छे, तथा रूपने धारण करवुं ते रूप छे. हवे अहीं
विज्ञानादिकने दुःख कह्युं ते मिथ्या छे, कारण के
दुःख तो कामक्रोधादिक छे, ज्ञान कांई दुःख
नथी. प्रत्यक्ष जोईए छीए केकोईने ज्ञान थोडुं छे, पण क्रोधलोभादिक घणा छे, तो ते दुःखी
छे, तथा कोईने ज्ञान घणुं छे पण क्रोधलोभादिक अल्प छे, वा नथी, तो ते सुखी छे. तेथी
विज्ञानादिक दुःख नथी.
वळी आयतन बार कहे छेपांच इन्द्रियो, तेना शब्दादिक पांच विषयो, एक मन, अने
एक धर्मायतन. हवे ए आयतन शामाटे कहे छे? कारण केतेओ सर्वने क्षणिक कहे छे. तो
तेनुं शुं प्रयोजन छे?
वळी जेनाथी रागादिकनो समूह नीपजे, एवो आत्मा अने आत्मीय ए छे नाम जेनुं,
ते समुदाय छे. त्यां अहंरूप आत्मा अने ममरूप आत्मीय जाणवा. पण तेने क्षणिक माने छे
एटले एने कहेवानुं पण कांई प्रयोजन नथी.
तथा सर्व संस्कार क्षणिक छे, एवी जे वासना ते मार्ग छे. हवे घणा काळ सुधी स्थायी
होय, एवी केटलीक वस्तुओ प्रत्यक्ष जोईए छीए. तमे कहेशो केएक अवस्था रहेती नथी
ते तो अमे पण मानीए छीए. सूक्ष्म पर्याय क्षणस्थायी छे. वळी ए वस्तुनो ज नाश मानो,
तो ए नाश थतो देखातो नथी, तो अमे केवी रीते मानीए? कारण के
बाळ, वृद्धादि अवस्थामां
एक आत्मानुं अस्तित्व जणाय छे. जो ते एक नथी, तो पहेलां अने पछीना कार्यनो एक कर्ता
केम माने छे? तुं कहीश के
‘‘संस्कारथी एम छे.’’ तो ए संस्कार कोने छे? जेने (ए संस्कार)
१.दुःखमायतनं चैव ततः समुदयो मतः
मार्गश्चेत्यस्य च व्याख्या क्रमेण श्रूयतामतः ।।३६।।
२.दुःखं संसारिणः स्कंधास्ते च पंञ्चप्रकीर्तिताः
विज्ञानं वेदना संज्ञा संस्कारोरूपमेव च ।।३७।। वि. वि. ।।३७।।
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १३३