तो एक ज प्रयोजन सहित अनेक प्रकारे व्याख्यान होय छे, तेने जुदा मत कोण कहे छे? परंतु
प्रयोजन ज भिन्नभिन्न होय छे. ते अहीं दर्शावीए छीएः —
✾ अन्यमतथी जैनधार्मनी तुलना ✾
जैनमतमां एक वीतरागभाव पोषवानुं प्रयोजन छे. कथाओमां, लोकादिकना
निरूपणमां, आचरणमां वा तत्त्वमां ज्यां – त्यां वीतरागताने ज पोषण करी छे. पण अन्य
मतोमां सरागभाव पोषवानुं प्रयोजन होवाथी, कषायी जीव अनेक युक्ति बनावी कल्पित रचना
करी, कषायभावने ज पोषे छे. जेम के – अद्वैतब्रह्मवादी – सर्वने ब्रह्म मानवा वडे, सांख्यमती –
सर्व कार्यो प्रकृतिनां मानी पोताने शुद्ध – अकर्ता मानवावडे, शिवमती तत्त्वने जाणवाथी ज सिद्धि
होवी मानवावडे, मीमांसक – कषायजनित आचरणने धर्म मानवावडे, बौद्ध – क्षणिक मानवावडे,
तथा चार्वाक – परलोकादिक नहि मानवावडे, विषयभोगादिरूप कषायकार्योमां स्वच्छंदी थवानुं ज
पोषण करे छे. जोके तेओ कोई ठेकाणे कोई कषाय घटाडवानुं पण निरूपण करे छे, तो ए
छळवडे कोई ठेकाणे अन्य कषायनुं पोषण करे छे. जेम गृहकार्य छोडी परमेश्वरनुं भजन करवुं
ठराव्युं, पण परमेश्वरनुं स्वरूप सरागी ठरावी, तेना आश्रये पोताना विषयकषायने पोषण करे
छे.
त्यारे जैनधर्ममां देव – गुरु – धर्मादिकनुं स्वरूप वीतराग ज निरूपण करी केवळ
वीतरागताने ज पोषण करे छे, अने ते प्रगट छे. केवळ अमे ज कहेता नथी, परंतु सर्व
मतवाळा कहे छे. अने ते आगळ अन्यमतनां ज शास्त्रोनी साक्षीवडे जैनमतनी समीचीनता
अने प्राचीनता प्रगट करतां निरूपण करीशुं.
अन्यमती भर्तृहरिए पण शृंगार प्रकरणमां एम कह्युं छे केः —
एको रागिषु राजते प्रियतमादेहार्द्धधारी हरो,
र्नरागेषु जिनो विमुक्तललनासङ्गो न यत्मात्परः ।
दुर्वारस्मरवाणपन्नगविषव्यासक्तमुग्धो जनः
शेषः कामविडंवितो हि विषयान् भोक्तुं न भोक्तुं क्षणः ।।१७।।
आ श्लोकमां सरागीओमां महादेव तथा वीतरागीओमां जिनदेवने प्रधान कह्या छे.
वळी सरागभावमां अने वीतरागभावमां परस्पर प्रतिपक्षीपणुं छे, तेथी ए बंने भला नथी;
परंतु तेमां एक ज हितकारी छे. अर्थात् वीतरागभाव ज हितकारी छे. जेना होवाथी तत्काळ
* रागीपुरुषोमां तो एक महादेव शोभे छे के जेमणे पोतानी प्रियतमा पार्वतीने अर्धा शरीरमां
धारण करी राखी छे. तथा विरागीओमां जिनदेव शोभे छे के – जेमना समान स्त्रीओनो संग छोडवावाळो
बीजो कोई नथी. बाकीना लोको तो दुर्निवार कामदेवना बाणरूप सर्पोना विषथी मूर्च्छित थया छे. के
जेओ कामनी विडंबणाथी न तो विषयोने सारी रीते भोगवी शके छे के – न तो छोडी शके छे.
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १३७