Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Anyamatathi Jain dharmani Tulana.

< Previous Page   Next Page >


Page 127 of 370
PDF/HTML Page 155 of 398

 

background image
तो एक ज प्रयोजन सहित अनेक प्रकारे व्याख्यान होय छे, तेने जुदा मत कोण कहे छे? परंतु
प्रयोजन ज भिन्नभिन्न होय छे. ते अहीं दर्शावीए छीएः
अन्यमतथी जैनधार्मनी तुलना
जैनमतमां एक वीतरागभाव पोषवानुं प्रयोजन छे. कथाओमां, लोकादिकना
निरूपणमां, आचरणमां वा तत्त्वमां ज्यांत्यां वीतरागताने ज पोषण करी छे. पण अन्य
मतोमां सरागभाव पोषवानुं प्रयोजन होवाथी, कषायी जीव अनेक युक्ति बनावी कल्पित रचना
करी, कषायभावने ज पोषे छे. जेम के
अद्वैतब्रह्मवादीसर्वने ब्रह्म मानवा वडे, सांख्यमती
सर्व कार्यो प्रकृतिनां मानी पोताने शुद्धअकर्ता मानवावडे, शिवमती तत्त्वने जाणवाथी ज सिद्धि
होवी मानवावडे, मीमांसककषायजनित आचरणने धर्म मानवावडे, बौद्धक्षणिक मानवावडे,
तथा चार्वाकपरलोकादिक नहि मानवावडे, विषयभोगादिरूप कषायकार्योमां स्वच्छंदी थवानुं ज
पोषण करे छे. जोके तेओ कोई ठेकाणे कोई कषाय घटाडवानुं पण निरूपण करे छे, तो ए
छळवडे कोई ठेकाणे अन्य कषायनुं पोषण करे छे. जेम गृहकार्य छोडी परमेश्वरनुं भजन करवुं
ठराव्युं, पण परमेश्वरनुं स्वरूप सरागी ठरावी, तेना आश्रये पोताना विषयकषायने पोषण करे
छे.
त्यारे जैनधर्ममां देवगुरुधर्मादिकनुं स्वरूप वीतराग ज निरूपण करी केवळ
वीतरागताने ज पोषण करे छे, अने ते प्रगट छे. केवळ अमे ज कहेता नथी, परंतु सर्व
मतवाळा कहे छे. अने ते आगळ अन्यमतनां ज शास्त्रोनी साक्षीवडे जैनमतनी समीचीनता
अने प्राचीनता प्रगट करतां निरूपण करीशुं.
अन्यमती भर्तृहरिए पण शृंगार प्रकरणमां एम कह्युं छे केः
एको रागिषु राजते प्रियतमादेहार्द्धधारी हरो,
र्नरागेषु जिनो विमुक्तललनासङ्गो न यत्मात्परः
दुर्वारस्मरवाणपन्नगविषव्यासक्तमुग्धो जनः
शेषः कामविडंवितो हि विषयान् भोक्तुं न भोक्तुं क्षणः
।।१७।।
आ श्लोकमां सरागीओमां महादेव तथा वीतरागीओमां जिनदेवने प्रधान कह्या छे.
वळी सरागभावमां अने वीतरागभावमां परस्पर प्रतिपक्षीपणुं छे, तेथी ए बंने भला नथी;
परंतु तेमां एक ज हितकारी छे. अर्थात् वीतरागभाव ज हितकारी छे. जेना होवाथी तत्काळ
* रागीपुरुषोमां तो एक महादेव शोभे छे के जेमणे पोतानी प्रियतमा पार्वतीने अर्धा शरीरमां
धारण करी राखी छे. तथा विरागीओमां जिनदेव शोभे छे केजेमना समान स्त्रीओनो संग छोडवावाळो
बीजो कोई नथी. बाकीना लोको तो दुर्निवार कामदेवना बाणरूप सर्पोना विषथी मूर्च्छित थया छे. के
जेओ कामनी विडंबणाथी न तो विषयोने सारी रीते भोगवी शके छे के
न तो छोडी शके छे.
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १३७