Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 128 of 370
PDF/HTML Page 156 of 398

 

background image
आकुळता घटी आत्मस्तुति योग्य थाय छे, जेनाथी आगामी भलुं थवुं केवळ अमे ज नथी
कहेता पण सर्वे मतवाळा कहे छे. तथा सरागभाव थतां तत्काळ आकुळता थाय छेनिंदनीक
थाय छे, अने भविष्यमां पण बूरुं थवुं भासे छे. माटे जेमां वीतरागभावनुं ज प्रयोजन
छे, एवो जैनमत ज इष्ट छे, पण जेमां सरागभावनुं प्रयोजन प्रगट कर्युं छे एवा अन्य
मतो अनिष्ट छे; तेने समान केम मनाय?
प्रश्नःए तो साचुं परंतु अन्यमतोनी निंदा करतां अन्यमती दुःख पामे, अने
बीजाओनी साथे विरोध थाय, तेथी निंदा शा माटे करो छो?
उत्तरःजो कषायपूर्वक निंदा करीए वा अन्यने दुःख उपजावीए तो अमे पापी
ज छीए, पण अहीं तो अन्यमतना श्रद्धानादिवडे जीवोने अतत्त्वश्रद्धान द्रढ थाय, अने तेथी
तेओ संसारमां दुःखी थाय, तेथी करुणाभाववडे अहीं यथार्थ निरूपण कर्युं छे. छतां कोई दोष
विना पण दुःख पामे, विरोध उपजावे, तो तेमां अमे शुं करीए? जेम मदिरानी निंदा करतां
कलाल दुःख पामे, कुशीलनी निंदा करतां वेश्यादिक दुःख पामे तथा खरुं
खोटुं ओळखवानी
परीक्षा बतावतां ठग दुःख पामे तो तेमां अमे शुं करीए? ए प्रमाणे जो पापीओना भयथी
धर्मोपदेश न आपीए तो जीवोनुं भलुं केम थाय? एवो तो कोई उपदेश नथी, के जे वडे
सर्व जीवोने चेन थाय. वळी सत्य कहेतां विरोध उपजावे, पण विरोध तो परस्पर झगडो
करतां थाय; पण अमे लडीए नहि, तो तेओ पोतानी मेळे ज उपशांत थई जशे. अमने
तो अमारा परिणामोनुं ज फळ थशे.
प्रश्नःप्रयोजनभूत जीवादितत्त्वोनुं अन्यथा श्रद्धान करतां तो मिथ्या-
दर्शनादिक थाय छे, पण अन्यमतोनुं श्रद्धान करतां मिथ्यादर्शनादिक केवी रीते थाय?
उत्तरःअन्यमतोमां विपरीत युक्ति प्ररूपी छे, जीवादितत्त्वोनुं स्वरूप यथार्थ न
भासे तेवा उपाय कर्या छे, ते शा माटे कर्या छे? जो जीवादितत्त्वोनुं यथार्थ स्वरूप भासे
तो वीतरागभाव थतां ज महंतपणुं देखाय, पण जे जीवो वीतरागी नथी, अने पोतानी
महंतता इच्छे छे, तेओ सरागभाव होवा छतां, पोतानी महंतता मनाववा माटे कल्पित युक्ति
वडे अन्यथा निरूपण करे छे. अद्वैतब्रह्मादिकना निरूपण वडे जीव
अजीवनुं, स्वच्छंदवृत्ति
पोषवा वडे आस्रवसंवरादिकनुं, तथा सकषायीवत् वा अचेतनवत् मोक्ष कहीने ए वडे तेओ
मोक्षनुं अयथार्थश्रद्धान पोषण करे छे. तेथी अहीं अन्य मतोनुं अयथार्थपणुं प्रगट कर्युं छे.
जो एनुं अन्यथापणुं भासे तो तत्त्वश्रद्धानमां रुचिवान थाय, अने तेओनी युक्तिवडे भ्रम
न थाय.
ए प्रमाणे अन्य मतोनुं निरूपण कर्युं.
१३८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
18