Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Anyamatana Granthothi Prachinata Ane Samichinata.

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अन्यमतना ग्रंथोथी जैनमतनी प्राचीनता अने समीचीनता
योगवासिष्ठ छत्रीसहजार श्लोक प्रमाण छे, तेना प्रथम वैराग्यप्रकरणमां अहंकार-
निषेधाध्यायमां वसिष्ठ अने रामना संवादमां कह्युं छे केः
रामोवाच :‘‘नाहं रामो न मे वांछा भावेषु च न मे मनः
शांतिमास्थातुमिच्छामि स्वात्मन्येव जिनो यथा’’ ।। (सर्ग १५, पृ. ३३)
आ श्लोकमां रामचंद्रजीए जिन समान थवानी इच्छा करी, तेथी रामचंद्रजी करतां
जिनदेवनुं उत्तमपणुं अने प्राचीनपणुं प्रगट थयुं. वळी दक्षिणामूर्ति सहस्रनाममां कह्युं छे केः
शिवोवाच :‘‘जैनमार्गरतो जैन जिन क्रोधो जितामयः’’
अहीं भगवंतनुं नाम जैनमार्गमां लीन तथा जैन कह्युं तेथी तेमां जैनमार्गनी प्रधानता
वा प्राचीनता प्रगट थई. वळी वैशंपायनसहस्रनाममां कह्युं छे केः
‘‘कालनेमिर्म्महावीरः शूरः शौरिर्जिनेश्वरः’’ (महाभारत अ. ५ श्लोक ८२ अ. १४९)
अहीं भगवाननुं नाम जिनेश्वर कह्युं, तेथी जिनेश्वर भगवान छे. वळी दुर्वासाॠषिकृत
‘‘महाम्निस्तोत्र’’मां एम कह्युं छे केः
‘‘तत्तदर्शनमुख्यशक्तिरिति च त्वं ब्रह्मकर्मेश्वरी
कर्तार्हन् पुरुषो हरिश्च सविता बुद्धः शिवस्त्वं गुरुः
’’
अहीं ‘अर्हंत तमे छो,’ ए प्रमाणे भगवाननी स्तुति करी, तेथी अरहंतमां
भगवानपणुं प्रगट थयुं.
वळी हनुमन्नाटकमां कह्युं छे केः
‘‘यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनः
बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटवः कर्त्तेति नैयायिकाः
अर्हन्नित्यथ जैनशासनरताः कर्मेति मीमांसकाः
सोऽयं वो विदधातु वांछितफलं त्रैलोक्यनाथ
प्रभुः
।।।।
१.हुं राम नथी, मारी कांई इच्छा नथी, अन्य भावो वा पदार्थोमां मारुं मन नथी, हुं तो
जिनदेव समान मारा आत्मामां शांति स्थापन करवा ज इच्छुं छुं.
२.आ हनुमन्नाटकना मंगलाचरणनो श्लोक छे तेनो अभिप्राय ए छे केजेनी शिवमार्गिओ
शिव कहीने, वेदांतिओ ब्रह्म कहीने, बौद्धो बुद्धदेव कहीने, नैयायिको कर्ता कहीने, जैनो अर्हंत्
कहीने, तथा मीमांसको कर्म कहीने उपासना करे छे, ते त्रैलोकनाथ प्रभु तमारा मनोरथने सफळ
करो! (हनुमान नाटक मंगळाचरण श्लोक
३)
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १३९