Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Shwetambar Mat Nirakaran.

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अहीं कुमारब्रह्मचारीओने स्वर्ग गया बताव्या, पण परस्पर विरोध छे.
वळी ॠषीश्वरभारतमां एम कह्युं छे केः
मद्यमांसाशनं रात्रौ भोजनं कन्दभक्षणम्
ये कुर्वन्ति वृथास्तेषां तीर्थयात्रां जपस्तपः ।।।।
वृथा एकादशी प्रोक्ता वृथा जागरणं हरेः
वृथा च पौष्करी यात्रा कृत्स्नं चान्द्रायणं वृथा ।।।।
चातुर्मास्ये तु सम्प्राप्ते रात्रिभोज्यं करोति यः
तस्य शुद्धिर्न विद्येत चान्द्रायणशतैरपि ।।।।
अहीं मद्यमांस, रात्रिभोजन, चोमासामां तो विशेषपणे रात्रिभोजन अने कंदभक्षणनो
निषेध कर्यो, त्यारे मोटा पुरुषोने मद्यमांसादिकनुं सेवन करवुं बतावे छे, तथा व्रतादिकमां
रात्रिभोजन वा कंदादिभक्षणने स्थापन करे छे. ए प्रमाणे विरुद्ध निरूपण करे छे.
ए ज प्रमाणे अन्यमतना शास्त्रोमां पूर्वापरविरुद्ध अनेक वचनो छे. शुं करीए? कोई
ठेकाणे तो पूर्वपरंपरा जाणी विश्वास अणाववा माटे यथार्थ कह्युं, त्यारे कोई ठेकाणे विषय
कषाय पोषवा अर्थे अयथार्थ कह्युं. हवे ज्यां पूर्वापरविरोध होय, तेनां वचन प्रमाण केवी रीते
करीए?
अन्यमतोमां क्षमाशीलसंतोषादिकने पोषण करतां वचनो छे ते तो जैनमतमां होय
छे, पण विपरीत वचनो छे ते तेमनां कल्पित छे. जैनमतानुसार वचनोना विश्वासथी तेमना
विपरीत वचनोनुं पण श्रद्धानादिक थई जाय, माटे अन्यमतोनुं कोई अंग भलुं देखीने पण त्यां
श्रद्धानादिक न करवुं, पण
जेम विष मेळवेलुं भोजन हितकारी नथी, तेम अहीं जाणवुं.
वळी कोई उत्तमधर्मनुं अंग जैनमतमां न होय अने अन्यमतमां होय; अथवा कोई
निषिद्धधर्मनुं अंग जैनमतमां होय अने अन्यमतमां न होय, तो अन्यमतने आदरो. पण एम
तो सर्वथा होय ज नहि, कारण के
सर्वज्ञना ज्ञानथी कांई छूपुं नथी, माटे अन्यमतोनुं
श्रद्धानादिक छोडी जैनमतनुं द्रढ श्रद्धानादिक करवुं. वळी काळदोषथी कषायी जीवोए जैनमतमां
पण कल्पितरचना करी छे, ते अहीं दर्शावीए छीए.
श्वेतांबरमतनिराकरण
श्वेतांबरमतवाळा कोईए सूत्र बनाव्यां, तेने तेओ गणधरनां कर्यां कहे छे, तेमने
पूछीए छीए केगणधरे आचारांगादिक बनाव्यां, के जे वर्तमानमां तमारे छे, ते एटला
प्रमाण सहित ज कर्यां हतां, के घणा प्रमाण सहित कर्यां हतां? जो एटला प्रमाण सहित
१४४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक