Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Anyalingathi Muktino Nishedh Gruhastha Muktino Nishedh Stri Muktino Nishedh.

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अणाववा अर्थे जे जिनमतानुसार कथन छे ते तो सत्य ज छे, दिगंबर पण तेम ज कहे
छे. परंतु जे कल्पित रचना करी छे, तेमां पूर्वापरविरुद्धपणुं वा प्रत्याक्षदि प्रमाणमां विरुद्धपणुं
भासे छे, ते अहीं दर्शावीए छीए
अन्यलिंगथी मुक्तिनो निषेध
अन्यलिंगीने, गृहस्थने, स्त्रीने वा चांडालादि शूद्रोने साक्षात् मोक्षप्राप्ति होवी माने छे,
पण एम बने नहि. कारण सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी एकता मोक्षमार्ग छे. हवे तेओ
सम्यग्दर्शननुं स्वरूप तो एवुं कहे छे के
अरहंतो महादेवो जावज्जीवं सुसाहणो गुरुणो
जिणपण्णत्तं तत्तं ए सम्मत्तं मए गहियं ।।।।
हवे अन्यलिंगीने अरहंत देव, साधु, गुरु, जिनप्रणीत तत्त्वनी मान्यता केम संभवे?
अने तेथी सम्यक्त्व पण न होय, तो मोक्ष केवी रीते होय?
अहीं जो कहेशो के‘‘अंतरंग श्रद्धान होवाथी तेमने सम्यक्त्व होय छे.’’ हवे
विपरीतलिंगधारकनी प्रशंसादिक करतां पण सम्यक्त्वने अतिचार कह्यो छे, तो
सत्यश्रद्धान थया पछी पोते विपरीतलिंगनो धारक केवी रीते रहे?
सत्यश्रद्धान थया
पछी महाव्रतादि अंगीकार कर्ये सम्यक्चारित्र होय ते अन्यलिंगीमां क्यांथी बने? जो
अन्यलिंगमां पण सम्यक्चारित्र होय, तो जैनलिंग अन्यलिंग समान थयुं, माटे अन्यलिंगीने
मोक्ष कहेवो मिथ्या छे.
गृहस्थमुकित निषेधा
वळी गृहस्थने मोक्ष कहे छे; पण हिंसादिक सर्वसावद्ययोगनो त्याग करतां
सम्यक्चारित्र होय छे. हवे सर्वसावद्ययोगनो त्याग करतां गृहस्थपणुं केम संभवे? अहीं कहेशो
के
‘‘अंतरंगनो त्याग थयो छे, पण अहीं तो त्रणे योग वडे त्याग करे छे, तो कायवडे त्याग
केवी रीते थयो? वळी बाह्यपरिग्रहादिक राखवा छतां पण महाव्रत होय छे.’’ तो महाव्रतोमां
बाह्यत्याग करवानी तो प्रतिज्ञा करवामां आवे छे, त्याग कर्या विना महाव्रत होय नहि, अने
महाव्रत विना छठ्ठुं आदि गुणस्थान पण न होई शके, तो मोक्ष केवी रीते होय? माटे गृहस्थने
मोक्ष कहेवो ए मिथ्यावचन छे.
स्त्रीमुकित निषेधा
वळी स्त्रीने मोक्ष कहे छे, पण जेनाथी सातमी नरकगमनयोग्य पाप न थई शके,
तेनाथी मोक्षकारणरूप शुद्धभाव केवी रीते थई शके? कारण केजेना भाव द्रढ होय ते ज
१४६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
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