Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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वळी अन्नादिकनो आहार कांई शरीरपुष्टतानुं मुख्य कारण नथी. प्रत्यक्ष जुओ! कोई
थोडो आहार करे छे, छतां शरीर घणुं पुष्ट होय छे, कोई घणो आहार करे छे, छतां शरीर
क्षीण रहे छे, पवनादिक साधवावाळा घणा काळ सुधी आहार लेता नथी, छतां तेमनुं शरीर
पुष्ट रह्या करे छे, तथा ॠद्धिधारी मुनि घणा उपवासादि करे छे, छतां तेमनुं शरीर पुष्ट
बन्युं रहे छे, तो केवळीने तो सर्वोत्कृष्टपणुं छे, एटले तेमने अन्नादिक विना पण शरीर
पुष्ट बन्युं रहे, तो एमां शुं आश्चर्य थयुं? वळी केवळी केवी रीते आहार माटे जाय, केवी
रीते याचे?
तेओ आहार अर्थे जाय, त्यारे समवसरण खाली केम रहे? अथवा कोई अन्यनुं लावी
आपवुं ठरावशो, तो कोण लावी आपे? तेमना मननी वात कोण जाणे? पूर्वे उपवासादिकनी
प्रतिज्ञा करी हती, तेनो निर्वाह केवी रीते थाय? जीव अंतराय सर्वत्र प्रतिभासे त्यां केवी रीते
आहारग्रहण करे? इत्यादि विरुद्धता भासे छे. त्यारे ते कहे छे के
‘‘आहार ग्रहे छे, परंतु
कोईने देखातो नथी.’’ हवे आहारग्रहणने निंद्य जाण्युं त्यारे तो ‘तेने न देखवुं’ अतिशयमां
लख्युं, पण तेनुं निंद्यपणुं तो रह्युं, बीजा नथी देखता तेथी शुं थयुं? ए प्रमाणे अनेक प्रकारथी
विरुद्धता उपजे छे.
वळी तेओ अन्य पण अविवेकपणानी वात कहे छे‘‘केवळीने निहार (शौच जवुं) कहे
छे, रोगादि थया कहे छे, तथा कहे छे के, कोईए तेजोलेश्या छोडी जे वडे वर्धमान स्वामीने
पेठुंगानो (पेचिसनो) रोग थयो, जेथी तेमने घणीवार निहार थवा लाग्यो.’’ पण तीर्थंकर
केवळीने पण एवा कर्मनो उदय रह्यो अने अतिशय न थयो, तो इंद्रादिवडे पूज्यपणुं केम
शोभे? वळी तेओ निहार केवी रीते करे? क्यां करे? ए प्रमाणे अनेक विपरीतरूप प्ररूपणा
करे छे. क्यां सुधी कहीए? कोई संभवती वात ज नथी. जेम कोई रोगादिकयुक्ति छद्मस्थने
क्रिया होय तेवी ज क्रिया केवळीने पण ठरावे छे.
वर्धमानस्वामीना उपदेशमां ‘हे गौतम?’ एम वारंवार कहेवुं ठरावे छे, पण तेमने
तो पोताना काळमां दिव्यध्वनि सहज थाय छे, अने त्यां सर्वने उपदेश थाय छे, एकला
गौतमने ज संबोधन केम बने? केवळीने नमस्कारादि क्रिया ठरावे छे, पण अनुराग विना
वंदना संभवे नहि, वळी गुणाधिकने वंदना संभवे, पण तेमनाथी कोई गुणाधिक रह्यो नथी,
तो ए केम बने?
वळी तेओ ‘हाटमां समवसरण ऊतर्युं’ कहे छे, पण इंद्रकृत समवसरण हाटमां केवी
रीते रहे? एटली बधी रचना त्यां केवी रीते समाय? प्रभु हाटमां शा माटे रह्या? शुं हाट
जेवी रचना करवा पण इंद्र समर्थ नहोतो, के जेथी हाटनो आश्रय लेवो पड्यो?
वळी कहे छे के‘‘केवळी उपदेश देवा गया,’’ पर घेर जईने उपदेश देवो तो
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १५१