अतिरागथी होय छे, मुनिने पण एम संभवे नहि तो केवळीने केवी रीते बने? ए ज प्रमाणे
अनेक विपरीतता त्यां प्ररूपे छे. केवळी शुद्धज्ञान – दर्शनमय रागादिरहित थया छे, तेमने
अघातिना उदयथी संभवती क्रिया कोई होय छे, पण मोहादिकनो अभाव थयो छे, तेथी
उपयोग जोडवाथी जे क्रिया थई शके, ते क्रिया संभवती नथी. पापप्रकृतिनो अनुभाग अत्यंत
मंद थयो छे, एवो मंद अनुभाग अन्य कोईने नथी, तेथी अन्य जीवोने पापउदयथी जे क्रिया
थती जोवामां आवे छे, ते केवळीने होय नहि.
ए प्रमाणे सामान्य मनुष्य जेवी क्रियानो सद्भाव केवळी भगवानने पण कही तेओ
देवना स्वरूपने अन्यथा प्ररूपे छे.
✾ मुनिने वस्त्रादिक उपकरणनो निषेधा ✾
गुरुनुं अन्यथा स्वरुप
वळी गुरुना स्वरूपने पण अन्यथा प्ररूपे छे. मुनिने वस्त्रादिक चौद
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उपकरण कहे छे, त्यां अमे पूछीए छीए के मुनिने निर्ग्रंथ कहे छे, तथा मुनिपद लेतां
नवप्रकारे सर्वपरिग्रहना त्याग वडे महाव्रत अंगीकार करे छे, त्यां ए वस्त्रादिक परिग्रह छे
के नहि? जो छे, तो त्याग कर्या पछी तेओ शामाटे राखे छे? तथा नथी, तो ए वस्त्रादिक
गृहस्थ राखे छे, तेने पण परिग्रह न कहो, मात्र सुवर्णादिकने ज परिग्रह कहो!
अहीं जो एम कहेशो के — ‘‘जेम क्षुधा अर्थे आहार ग्रहण करीए छीए, तेम शीत –
उष्णादिक अर्थे वस्त्रादिक ग्रहण करीए छीए,’’ परंतु मुनिपद अंगीकार करतां आहारनो तो
त्याग कर्यो नथी, पण परिग्रहनो तो त्याग कर्यो छे. अन्नादिकनो संग्रह करवो ए तो परिग्रह
छे, परंतु भोजन करवा जाय, ए परिग्रह नथी. वस्त्रादिकनो संग्रह करवो वा पहेरवां,
ए सर्व परिग्रह ज छे. लोकमां पण प्रसिद्ध छे.
जो कहेशो केे — ‘‘शरीरनी स्थिति अर्थे वस्त्रादिक राखीए छीए पण ममत्व नथी, तेथी
तेने परिग्रह कहेता नथी.’’ पण श्रद्धानमां तो ज्यारथी सम्यग्द्रष्टि थयो, त्यारथी ज सर्व
परद्रव्यमां ममत्वनो अभाव थयो छे, एटले ए अपेक्षाए तो चोथुं गुणस्थान ज परिग्रहरहित
कहो! तथा जो प्रवृत्तिमां ममत्व नथी तो ग्रहण केवी रीते करे छे? माटे वस्त्रादिक ग्रहण –
धारण ज्यारे छूटशे, त्यारे ज निष्परिग्रही थशे.
जो कहेशो के – ‘‘वस्त्रादिक कोई लई जाय तो क्रोध न करे, क्षुधादिक लागतां तेने वेचे
१. पात्र – १, बंध – २, पात्र केसरीकर – ३, पाटलीयो – ४ – ५, रजस्त्राण – ६, गोच्छक – ७, रजोहरण – ८,
मुखवस्त्रिका – ९, बे सुतराउ कपडा – १० – ११, एक ऊननुं कपडुं – १२. मात्रक (पेशाबनुं पात्र) -
१३, चोलपट्ट – १४, (बृ० कल्पसूत्र उ० भाग ३ गा. ३९६२ थी ३९६५ सुधी)
१५२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक