अहीं ‘‘कल्याण, पाप अने उभय ए त्रणने शास्त्र सांभळीने जाण’’, एम कह्युं. हवे
उभय तो पाप अने कल्याण मळतां थाय, एवा कार्यनुं होवुं पण ठर्युं. त्यां अमे पूछीए
छीए के – केवळ धर्मथी तो उभय घटतुं ज छे, परंतु केवळ पापथी उभय बूरुं छे के भलुं?
जो बूरुं छे, तो एमां तो कंईक कल्याणनो अंश मळेलो छे, तो तेने केवळ पापथी बूरुं केम
कहेवाय? तथा जो भलुं छे, तो केवळ पाप छोडी एवां कार्य करवां योग्य ठर्यां, वळी युक्तिथी
पण एम ज संभवे छे. कोई त्यागी मंदिरादि करावतो नथी, पण सामायिकादि निरवद्य
कार्योमां प्रवर्ते छे, तो तेने छोडी तेणे प्रतिमादि कराववा – पूजनादि करवुं उचित नथी, परंतु
कोई पोताने रहेवा माटे मकान बनावे, ते करतां चैत्यालयादि कराववावाळो हीन नथी, हिंसा
तो थई पण पेलाने तो लोभपापानुरागनी वृद्धि थई, त्यारे आने लोभ छूट्यो अने धर्मानुराग
थयो. वळी कोई व्यापारादि कार्य करे छे, ते जेमां नुकशान थोडुं अने नफो घणो होय तेवुं
ज कार्य करे छे, तेम ज पूजनादि कार्य पण जाणवा, एटले के कोई व्यापारादि कार्य करे
तो तेनाथी पूजनादि कार्य करवां हीणा नथी, कारण के – त्यां तो हिंसादिक घणी थाय छे,
लोभादिक वधे छे, तथा ए पापनी ज प्रवृत्ति छे, अने अहीं हिंसादिक किंचित् थाय छे,
लोभादिक घटे छे, तथा धर्मानुराग वधे छे अथवा जे त्यागी न होय, पोताना धनने पापमां
खरचता होय, तेमणे तो चैत्यालयादि कराववां योग्य छे. तथा निरवद्य सामायिकादि कार्योमां
उपयोगने न लगावी शके, तेमने पूजनादि कार्य करवानो निषेध नथी.
अहीं तमे कहेशो के — ‘‘निरवद्य सामायिक आदि कार्य ज केम न करीए, धर्ममां ज
काळ गाळवो त्यां एवां कार्य शा माटे करीए?’’
तेनो उत्तर — जो शरीरवडे पाप छोडवाथी ज निरवद्यपणुं थतुं होय तो एम ज करो,
पण तेम तो थतुं नथी, परिणामोथी पाप छूटतां ज निरवद्यपणुं थाय छे. हवे अवलंबन विना
सामायिकादिकमां जेनो परिणाम न लागे, ते पूजनादिवडे त्यां पोतानो उपयोग लगावे छे, अने
त्यां नानाप्रकारनां अवलंबनवडे उपयोग लागी जाय छे. जो ते त्यां उपयोग न लगावे, तो
पापकार्योमां उपयोग भटके, अने तेथी बूरुं थाय, माटे त्यां प्रवृत्ति करवी युक्त छे.
तमे कहो छो के — ‘‘धर्मना अर्थे हिंसा करतां तो महापाप थाय छे, अने बीजा
ठेकाणे हिंसा करतां थोडुं पाप थाय छे’’ पण प्रथम तो ए सिद्धांतनुं वचन नथी, अने
युक्तिथी पण मळतुं नथी. कारण के – एम मानतां तो इन्द्र जन्मकल्याणकमां घणा जळवडे
अभिषेक करे छे, तथा समवसरणमां देवो पुष्पवृष्टि, चमर ढाळवा इत्यादि कार्य करे छे,
तो ते महापापी थयो.
तमे कहेशो के — ‘‘तेमनो एवो ज व्यवहार छे.’’ पण क्रियानुं फळ तो थया विना
रहेतुं नथी. जो पाप छे, तो इन्द्रादिक तो सम्यग्द्रष्टि छे, तेओ एवुं कार्य शा माटे करे?
तथा जो धर्म छे, तो तेने निषेध शा माटे करो छो?
१६४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक