वळी तमने ज पूछीए छीए के – तीर्थंकरनी वंदना माटे राजाओ आदि गया,
साधुवंदनार्थे दूर दूर जईए छीए, तथा सिद्धांत सांभळवा आदि कार्यो अर्थे गमनादि करीए
छीए, त्यां मार्गमां हिंसा थाय छे. वळी साधर्मी जमाडीए छीए, साधुनुं मरण थतां तेनो
संस्कार करीए छीए, साधु थतां उत्सव करीए छीए. इत्यादि प्रवृत्ति आजे पण देखाय छे.
हवे त्यां पण हिंसा तो थाय छे, पण ए कार्यो तो धर्मना अर्थे ज छे. अन्य कोई प्रयोजन
नथी. जो त्यां महापाप ऊपजे छे, तो पूर्वे एवां कार्य कर्यां तेनो निषेध करो, तथा आजे
पण गृहस्थो एवां कार्य करे छे, तेनो पण त्याग करो. अने जो धर्म ऊपजे छे, तो धर्मने
अर्थे हिंसामां महापाप बतावी शा माटे भमावो छो?
माटे आ प्रमाणे मानवुं युक्त छे के – जेम थोडुं धन ठगातां जो घणा धननो लाभ
थतो होय, तो ते कार्य करवुं भलुं छे, तेम थोडी हिंसादिक पाप थतां पण जो घणो धर्म
ऊपजतो होय, तो ते कार्य करवुं योग्य छे. जो थोडा धनना लोभथी कार्यने बगाडे तो ते
मूर्ख छे, तेम थोडी हिंसाना भयथी महाधर्म छोडे तो ते पापी ज थाय छे. वळी कोई घणुं
धन ठगावे तथा थोडुं धन उपजावे, वा न उपजावे तो ते मूर्ख छे; तेम हिंसादिवडे घणा पाप
उपजावे, अने भक्ति आदि धर्ममां थोडो प्रवर्ते, वा न प्रवर्ते, तो ते पापी ज थाय छे. वळी
जेम ठगाया विना ज धननो लाभ होवा छतां पण ठगाय तो ते मूर्ख छे; तेम निरवद्यधर्मरूप
उपयोग होय, तो सावद्यधर्ममां उपयोग लगाववो योग्य नथी.
ए प्रमाणे अनेक परिणामो वडे पोतानी अवस्था जोई, जेथी भलुं थाय ते
करवुं, पण एकांतपक्ष कार्यकारी नथी. बीजुं, अहिंसा ज केवळ धर्मनुं अंग नथी, पण
रागादिकभाव घटवा ए धर्मनुं मुख्य अंग छे, माटे जेथी परिणामोमां रागादि घटे ते
कार्य करवुं.
वळी गृहस्थोने अणुव्रतादिनुं साधन थया विना ज सामायिक, प्रतिक्रमण अने प्रौषधादि
क्रियाओनुं आचरण मुख्य करावे छे. हवे सामायिक तो राग-द्वेषरहित साम्यभाव थतां थाय
छे, पण पाठमात्र भणवाथी वा ऊठ – बेस करवाथी तो थतुं नथी.
कदाचित् कहेशो के — ‘‘अन्य कार्य करत, ते करतां तो भलुं छे!’’ ए साचुं, परंतु
सामायिकपाठमां प्रतिज्ञा तो एवी करे छे के – ‘‘मन – वचन – कायाथी सावद्यने करीश नहि,
करावीश नहि.’’ हवे मनमां तो विकल्प थया ज करे छे, तथा वचन – कायामां पण कदाचित्
अन्यथा प्रवृत्ति थाय छे, त्यां प्रतिज्ञा भंग थाय छे. हवे प्रतिज्ञा भंग करवा करतां तो न
करवुं भलुं छे, कारण प्रतिज्ञा भंग करवी ए महापाप छे.
वळी अमे पूछीए छीए के — कोई प्रतिज्ञा करतो नथी पण भाषापाठ भणे छे, अने
तेनो अर्थ जाणी तेमां उपयोग राखे छे; तथा कोई प्रतिज्ञा करी तेने बराबर पाळतो नथी,
पांचमो अधिकारः अन्यमत निराकरण ][ १६५