Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Kshetrapal, Padmavati Aadine Pujavano Nishedh.

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इत्यादि अनेक प्रकारथी ज्योतिषीदेवोने पूजे छे, ते मिथ्या छे.
वळी देवीदहाडी आदि छे, तेमां कोई तो व्यंतरी वा ज्योतिषिणी छे, तेनुं अन्यथा
स्वरूप मानी कोई पूजनादिक करे छे, तथा कोई कल्पित छे, तेनुं पण कल्पना वडे ज पूजनादिक
करे छे.
ए प्रमाणे व्यंतरादिकना पूजननो निषेध कर्यो.
क्षेत्रपाल, पद्मावती आदिने पूजवानो निषेधा
प्रश्नःक्षेत्रपाल, दहाडी अने पद्मावती आदि देवी, तथा यक्षयक्षिणी
आदि के जे जैनमतने अनुसरे छे, तेमनुं पूजनादि करवामां तो दोष नथी?
उत्तरःजैनमतमां तो संयम धारवाथी पूज्यपणुं होय छे. हवे देवोने संयम होतो
ज नथी, वळी तेमने सम्यक्त्वी मानी पूजीए छीए; तो भवनत्रिक देवोमां सम्यक्त्वनी पण
मुख्यता नथी. तथा जो सम्यक्त्ववडे ज पूजीए, तो सर्वार्थसिद्धि अने लौकांतिक देवोने ज केम
न पूजीए? तमे कहेशो ते ‘‘आमने जिनभक्ति विशेष छे,’’ पण भक्तिनी विशेषता तो सौधर्म
इन्द्रने पण छे तथा ते सम्यग्द्रष्टि पण छे, तो तेने छोडी आमने शामाटे पूजो छो? तमे
कहेशो के ‘‘जेम राजाने प्रतिहारादिक छे, तेम तीर्थंकरने आ क्षेत्रपालादिक छे,’’ पण
समवसरणादिमां तो तेमनो अधिकार ज नथी. माटे ए जूठी मान्यता छे. वळी जेम
प्रतिहारादिक द्वारा राजाने मळी शकाय छे, तेम ए तीर्थंकरनो मेळाप करावता नथी, त्यां तो
जेने भक्ति होय, ते तीर्थंकरनां दर्शनादिक करे छे. अने ए पण कांई कोईने आधीन नथी.
जुओ तो खरा आ अज्ञानता! आयुधादिसहित, अने रौद्र छे स्वरूप जेनुं, तेनी गाई
गाईने भक्ति करे छे. हवे जैनमतमां पण जो रौद्र रूप पूज्य थयुं तो ए पण अन्यमतना
समान ज थयो. तीव्र मिथ्यात्वभावथी जैनमतमां पण एवी विपरीत प्रवृत्तिरूप मान्यता
होय छे.
ए प्रमाणे क्षेत्रपाळादिकने पण पूजवा योग्य नथी.
वळी गायसर्पादिक तिर्यंच, के जे पोतानाथी प्रत्यक्ष हीन भासे छे, तेमनो
तिरस्कारादिक पण करी शकीए छीए, तथा तेमनी निंद्यदशा प्रत्यक्ष जोईए छीए. वृक्ष, अग्नि,
जलादिक स्थावर छे, ते तो तिर्यंचोथी पण अत्यंत हीन अवस्थाने प्राप्त जोईए छीए. तथा
शस्त्र, खडियो वगेरे तो अचेतन छे, सर्वशक्तिथी हीन प्रत्यक्ष जोईए छीए. तेमां पूज्यपणानो
उपचार पण संभवतो नथी, तेथी तेमने पूजवा ए महामिथ्याभाव छे. तेमने पूजवाथी प्रत्यक्ष
वा अनुमानथी पण कोई फळप्राप्ति भासती नथी. तेथी तेमने पूजवा ए योग्य नथी.
छठ्ठो अधिकारः कुदेव-कुगुरु-कुधर्म-निराकरण ][ १७३