पण जेने न मानवा – पूजवानो निश्चय छे, तेने तेओ कांई पण कहेता देखाता नथी. वळी प्रयोजन
तो क्षुधादिकनी पीडा होय तो होय, पण ते तो तेमने व्यक्त थती नथी, जो थती होय तो तेमना
अर्थे नैवेद्यादिक आपीए छीए, तेने तेओ केम ग्रहण करता नथी? अथवा बीजाओने जमाडवा
आदि करवानुं शा माटे कहे छे? तेथी तेमनी क्रिया कुतूहलमात्र छे. अने पोताने तेमने कुतूहलनुं
स्थान थतां दुःख ज थाय, हीनता थाय, माटे तेमने मानवा – पूजवा योग्य नथी.
प्रश्नः — ए व्यंतरो एम कहे छे के – ‘‘गया आदिमां पिंडदान करो, तो अमारी
गति थाय, अमे फरीथी आवीए नहि.’’ ए शुं छे?
उत्तरः — जीवोने पूर्वभवना संस्कार तो रहे ज छे, अने व्यंतरोने पूर्वभवना
स्मरणादिथी विशेष संस्कार छे, तेथी पूर्वभवमां तेने एवी ज वासना हती के ‘‘गयादिकमां
पिंडदानादि करतां गति थाय छे,’’ तेथी तेओ एवां कार्य करवानुं कहे छे. मुसलमान वगेरे
मरीने व्यंतर थाय छे, तेओ ए प्रमाणे कहेता नथी. तेओ पोताना संस्काररूप ज वाक्य कहे
छे. जो सर्व व्यंतरोनी गति ए ज प्रमाणे थती होय, तो बधा समान प्रार्थना करे, पण
एम तो नथी, एम समजवुं.
ए प्रमाणे व्यंतरादिनुं स्वरूप समजवुं.
वळी सूर्य, चंद्र, ग्रहादिक ज्योतिषीने पूजे छे, ते पण भ्रम छे. सूर्यादिकने पण
परमेश्वरनो अंश मानी पूजे छे, पण तेमनामां तो एक प्रकारनी ज अधिकता भासे छे, हवे
प्रकाशमान तो अन्य रत्नादिक पण छे, तेनामां अन्य कोई एवुं लक्षण नथी, के जेथी तेने
परमेश्वरनो अंश मानीए. चंद्रमादिकने पण धनादिनी प्राप्ति अर्थे पूजे छे. पण तेने पूजवाथी
ज जो धन थतुं होय, तो सर्व दरिद्री ए कार्य करे छे, तेथी ए पण मिथ्याभाव छे. वळी
ज्योतिषना विचारथी खोटा ग्रहादिक आवतां तेनुं पूजनादिक करे छे, तेना अर्थे दानादिक आपे
छे, पण ते तो जेम हरणादिक पोतानी मेळे गमनादिक करे छे, हवे ते पुरुषने जमणी –
डाबी बाजुए आवतां आगामी सुख – दुःखना ज्ञाननुं कारण थाय छे, पण कांई सुख – दुःख
आपवा ते समर्थ नथी; तेम ग्रहादिक स्वयं गमनादिक करे छे, अने ते प्रमाणे यथासंभव
योग प्राप्त थतां, आगामी सुख – दुःख थवाना ज्ञाननुं कारण थाय छे, पण कांई सुख – दुःख
आपवा ते समर्थ नथी. कोई तेमनुं पूजनादिक करे छे, तेने पण इष्ट थतुं नथी, तथा कोई
नथी करता, छतां तेने इष्ट थाय छे, माटे तेमनुं पूजनादि करवुं ते मिथ्याभाव छे.
अहीं कोई कहे छे के — ‘‘आपवुं, पूजनादि करवुं ए तो पुण्य छे, तेथी ते भलुं
ज छे.’’
तेनो उत्तर — धर्मना अर्थे आपवुं, पूजनादि करवुं ए पुण्य छे. पण अहीं तो दुःखना
भयथी अने सुखना लोभथी आपे छे, पूजे छे, तेथी ते पाप ज छे.
१७२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक